सबरीमाला मामले पर बहस में सिंघवी बोले, आस्था की सत्यता की जांच करना कोर्ट का काम नहीं
नई दिल्ली, 15 अप्रैल । सबरीमाला मंदिर मामले पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान मंदिर का प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि कोर्ट का काम आस्था की सत्यता की जांच करना नहीं है। सिंघवी ने ये दलील मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान बेंच के समक्ष रखी।
सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है बल्कि यह समान पहचान रखने वाले लोगों के समूह, संप्रदाय या पंथ की मान्यताओं और परंपराओं का समुच्चय है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है लेकिन यह अधिकार इतना व्यापक नहीं हो सकता कि उसी धर्म या संप्रदाय के बाकी अनुयायियों के सामूहिक अधिकारों का हनन होने लगे।
सिंघवी ने कहा कि अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता की जो सीमाएं तय की गई हैं वे संविधान सभा में लंबी और गंभीर चर्चा के बाद तय की गई थीं। अगर कोर्ट इसके अलावा नई या अप्रत्यक्ष पाबंदियां जोड़ती है तो संविधान निर्माताओं द्वारा बनाया गया संतुलन गड़बड़ा जाएगा। अनुच्छेद 25 के अधिकारों को संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए न कि किसी एक अधिकार को इतना बड़ा नहीं माना जा सकता है कि दूसरा अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाए।
इस मामले में केंद्र सरकार ने कहा है कि 2018 का फैसला महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की धारणा पर आधारित था। 09 अप्रैल को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि ये मामला किसी एक लिंग के पक्ष-विपक्ष का नहीं है बल्कि ये धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं से जुड़ा हुआ है। मेहता ने कहा था कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध है या उन्हें विशेष परंपराओं का पालन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि केरल के कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर में पुरुष पारंपरिक रुप से महिलाओं की तरह साड़ी पहनकर पूजा करते हैं। ये परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मेहता ने कहा था कि हर धार्मिक स्थल की अपनी अलग परंपराएं होती हैं, जिन्हें एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय ने 08 अप्रैल को कहा था कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार उसके पास है। उच्चतम न्यायालय ने ये बातें तब कही थी जब केंद्र सरकार ने दलील दी कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। तब न्यायाधीश बीवी नागरत्ना ने कहा कि सार्वजनिक नैतिकता स्थिर नहीं है। जो 1950 के दशक में अनैतिक या अश्लील माना जाता था वह आज वैसा नहीं है। न्यायाधीश नागरत्ना ने पूछा कि क्या हम 50 के दशक के मानकों को संकीर्ण मानसिकता कह सकते हैं। उन्होंने कहा था कि समाज के साथ नैतिकता बदलती रहती है, इसलिए इसे केवल एक पुराने नजरिये से नहीं देखा जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय की 9 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरु की थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।









