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1993 के सीरियल ट्रेन ब्लास्ट के अभियुक्तों की समय पूर्व रिहाई से हाईकोर्ट का इनकार

जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह आदेश अशफाक खान, एफआर सूफी, एआर अंसारी, मोहम्मद एजाज अकबर, मोहम्मद अमीन, मोहम्मद शमसुद्दीन और मोहम्मद अफाक की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियुक्त टाडा के तहत अपराध में आजीवन कारावास की सजा के दोषी है। ऐसे में उन्हें समय से पूर्व रिहा नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा के अधिकार के तहत हाईकोर्ट अपीलीय अदालत की तरह तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन कर दखल नहीं दे सकता, जब तक की प्रशासनिक निर्णय मनमाना और कानून के विपरीत ना हो। खंडपीठ ने कहा कि आतंकवादी गतिविधियां अत्यंत जघन्य अपराध हैं। आतंकवाद जैसे गंभीर अपराध में दोषी अभियुक्तों की रिहाई ना केवल समाज के लिए खतरा है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर जोखिम पैदा करेगा।

याचिकाओं में कहा गया कि दिसंबर, 1993 में हुए सीरियल ट्रेन बम ब्लास्ट मामले में उन्हें दोषी मानते हुए अजमेर की विशेष टाडा कोर्ट ने 28 फरवरी, 2024 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस आदेश की अपील भी सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई, 2016 को खारिज कर दी थी। याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता बीस साल की अवधि से अधिक समय से जेल में बंद है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 4 मई, 2011 को पत्र जारी कर कहा था कि आतंकवादी अपराधों को एक अलग श्रेणी में रखा जाए और सजा कम करने पर विचार से पहले अभियुक्त को कम से कम बीस साल की सजा भुगतनी जरूरी है। याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता बीस साल की अवधि से अधिक समय जेल में भुगत चुके हैं। ऐसे में उन्होंने समय पूर्व रिहाई के लिए गृह मंत्रालय में अभ्यावेदन दिया था, लेकिन उसे दिसंबर, 2022 और मार्च, 2024 को खारिज कर दिया गया। ऐसे में गृह मंत्रालय के आदेश को रद्द कर उन्हें समय पूर्व रिहा किया जाए। जिसका विरोध करते हुए केन्द्र सरकार के एएसजी भरत व्यास ने कहा कि जिन आरोपियों को टाडा के तहत सजा दी जाती है, उनकी सजा को कम करने पर प्रतिबंध है। ऐसे में याचिका को खारिज किया जाए। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।