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सुकमा पुलिस लाइन में पहली बार गरबा-डांडिया महोत्सव हुआ आयाेजन

सुकमा, 18 अक्टूबर । जिले की पहचान नक्सल हिंसा, मुठभेड़ों और गोलियों की गूंज से होती थी, वहां अब नवरात्रि के उल्लास में गरबा-डांडिया की छड़ियां खनक रही हैं। जिन दुर्गम जंगलों में सुरक्षा बलों के जवान हथियार थामकर नक्सल मोर्चे पर डटे रहते थे, उन्हीं जवानों के परिवार अब सांस्कृतिक आयोजनों में एक साथ कदमताल कर रहे हैं। बदलते सुकमा की यह तस्वीर न केवल शांति की नई उम्मीद जगाती है, बल्कि पुलिस परिवारों के भीतर उत्साह, आत्मीयता और सामाजिक सौहार्द का संदेश भी देती है। सुकमा पुलिस लाइन में बीती रात पहली बार गरबा-डांडिया महोत्सव का आयोजन किया गया।

पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में पुलिस कर्मियों, महिला कमांडोज, शहीद जवानों के परिजनों और बच्चों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। पारंपरिक वेशभूषा में सजे प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों से पुलिस लाइन का वातावरण भक्तिमय और उत्सवमय हो उठा।

सुकमा जैसे संवेदनशील जिले में सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले जवानों की दिनचर्या चुनौतियों और जोखिमों से भरी रहती है। घने जंगलों और दुर्गम इलाकों में नक्सल विरोधी अभियानों में साहस दिखाने वाली पुलिस की विशेष इकाई ‘दुर्गा फाइटर्स’ की महिला कमांडोज ने जब डांडिया की छड़ियों के साथ ताल मिलाई, तो आयोजन का उत्साह देखते ही बना। वर्दी में अनुशासन और मोर्चे पर अदम्य साहस का परिचय देने वाली महिला जवानों का पारंपरिक नृत्य के प्रति उत्साह इस महोत्सव का प्रमुख आकर्षण रहा। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि कर्तव्य की कठोर जिम्मेदारियों के बीच भी भारतीय संस्कृति, परंपराओं और पारिवारिक खुशियों के लिए जगह बनाई जा सकती है।

इस महोत्सव में जिले के शहीद जवानों के परिजनों, माताओं, बहनों और बच्चों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। उनकी सहभागिता ने आयोजन को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे पुलिस परिवारों के आपसी जुड़ाव और सम्मान का अवसर बना दिया। महिलाओं और बच्चों ने पारंपरिक परिधानों में गरबा-डांडिया की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन भी किया गया। पुलिस परिवारों के लिए यह आयोजन रोजमर्रा की व्यस्तताओं और तनावपूर्ण जिम्मेदारियों से निकलकर एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा करने का अवसर बना।

गरबा-डांडिया महोत्सव में कलेक्टर अमित कुमार, सीआरपीएफ डीआईजी आनंद सिंह और पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर सपरिवार शामिल हुए। वरिष्ठ अधिकारियों की पारिवारिक सहभागिता ने कार्यक्रम को और खास बना दिया। अधिकारियों ने प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाया और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की सराहना की। उनके साथ परिवारों की मौजूदगी ने पुलिस और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय के साथ मानवीय जुड़ाव की तस्वीर भी प्रस्तुत की।

पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर ने कहा कि पुलिस बल की ड्यूटी अत्यंत चुनौतीपूर्ण, तनावपूर्ण और जोखिम भरी होती है। ऐसे सांस्कृतिक आयोजन जवानों और उनके परिवारों को मानसिक सुकून देने के साथ नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। इससे आपसी मेलजोल बढ़ता है और पुलिस परिवारों को एक साझा मंच मिलता है। गुर्जर ने कहा कि सुकमा में गरबा-डांडिया का यह आयोजन बदलते सामाजिक वातावरण की एक सुखद तस्वीर के रूप में सामने आया। जहां कभी हिंसा और भय की खबरें सुर्खियां बनती थीं, वहीं अब सांस्कृतिक उत्सव, पारिवारिक सहभागिता और उल्लास की गूंज सुनाई दे रही है। पुलिस लाइन में थिरकते कदमों ने यह अहसास कराया कि शांति की राह पर आगे बढ़ते सुकमा में सुरक्षा के साथ-साथ सामान्य और खुशहाल जीवन की उम्मीदें भी मजबूत हो रही हैं।