बस्तर संभाग की हजारों देवगुड़ियां वनाें के संरक्षक, यहां पेड़ काटना वर्जित
जगदलपुर, 05 जून । बस्तर संभाग में मौजूद 8 हजार से ज्यादा देवगुड़ियां आज बस्तर के लिए ऑक्सीजन जाेन की तरह काम कर रही हैं। ये देवगुड़ियां केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि घने पेड़ों से घिरे संरक्षित वन क्षेत्र हैं।
देवगुड़ियां आदिवासियों के पूजा-पाठ के पवित्र स्थल हैं, जिन्हें कई इलाकों में देव स्थल भी कहा जाता है। बस्तर का आदिवासी समाज जल, जंगल और जमीन को ही जीवन और आस्था का आधार मानता है। इसी वजह से देवगुड़ियों में लगे पेड़ों का विशेष महत्व है। यहां पेड़ काटना तो दूर, जमीन पर गिरी सूखी डंठल या लकड़ी भी बिना अनुमति कोई नहीं उठाता है।
घुरवा समाज के महासचिव गंगाराम कश्यप ‘घुर’ का कहना है कि ऐसे बदलते मौसम में बस्तर के आदिवासियों की परंपराएं पर्यावरण संरक्षण की बड़ी मिसाल बनकर सामने आती हैं। पेन-पुंगार यानी फूल और प्रकृति की पूजा, तथा मानसून से पहले मनाया जाने वाला माटी तिहार, प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने की परंपरा है। बस्तर के आदिवासी सरल और स्वाभिमानी लोग हैं। जंगल उनके जीवन का केंद्र है। वे प्रकृति पूजक हैं और पेड़-पौधों को देवी-देवताओं का वास मानते हैं। यही वजह है कि जनजातीय समुदायों में पेड़-पौधों की रक्षा और संरक्षण को लेकर गहरी मान्यताएं हैं। बस्तर के आदिवासियों का पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति संरक्षण के तरीके अनूठे हैं।









