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जीते जी सेवा, यही सच्चा श्राद्ध

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। हमारे संस्कारों में माँ के चरणों में ममता, त्याग और करुणा का संसार दिखाई देता है तो पिता के जीवन में परिश्रम, जिम्मेदारी और सुरक्षा की छाया। माँ-बाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़ देते हैं। वे अपनी जरूरतें कम कर बच्चों की जरूरतें पूरी करते हैं। उनकी खुशियाँ बच्चों की मुस्कान में बसती हैं और उनका जीवन परिवार को सँवारने में बीत जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस उम्र में उन्हें सबसे अधिक प्रेम, सम्मान और सहारे की आवश्यकता होती है, उसी समय कई बुजुर्ग अपने ही घर में उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं।

हमारे समाज में श्राद्ध, तर्पण और पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करने की परंपरा है। लोग श्रद्धापूर्वक भोजन कराते हैं, दान देते हैं और धार्मिक कर्मकांड करते हैं। यह परंपरा हमारी सांस्कृतिक स्मृति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है लेकिन एक सवाल हमें अपने भीतर जरूर पूछना चाहिए- क्या उस श्रद्धा का अर्थ केवल मृत्यु के बाद के कर्मकांड तक सीमित है? यदि माँ-बाप जीवित हैं और उन्हें दो वक्त की रोटी, सम्मान के दो शब्द तथा अपनापन देने में हम पीछे हट जाते हैं तो मृत्यु के बाद किया गया भव्य भोज हमारी संवेदनहीनता को कैसे ढँक सकता है?

आज परिवारों में आर्थिक समृद्धि बढ़ी है लेकिन कई जगह भावनात्मक समृद्धि कम होती दिखाई देती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, नौकरी, व्यवसाय और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच माता-पिता के लिए समय निकालना कठिन समझा जाने लगा है। कई बुजुर्गों को घर में रहते हुए भी अकेलापन महसूस होता है। जिन पिता ने पसीना बहाकर घर बनाया, वही पिता बुढ़ापे में बेटे के व्यस्त जीवन में बाधा समझे जाने लगते हैं। जिन माताओं ने अपनी भूख दबाकर बच्चों को खिलाया, वही माँ कभी-कभी अपने ही घर में उपेक्षित हो जाती है।

सबसे पीड़ादायक स्थिति तब होती है जब जीवित माँ-बाप को ताने मिलते हैं, उनकी आवश्यकताओं को बोझ समझा जाता है और उनकी भावनाओं को महत्व नहीं दिया जाता। मृत्यु के बाद उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने के लिए लंबी कतार लग जाती है। जीते जी जिनसे बातचीत करने का समय नहीं था, उनके लिए मृत्यु के बाद बड़े-बड़े आयोजन किए जाते हैं। यह विरोधाभास केवल पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदना पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।

पिता का जीवन अक्सर परिवार के लिए संघर्ष की कहानी होता है। सीमित साधनों में उन्होंने बच्चों की शिक्षा, विवाह, घर और भविष्य की चिंता की। अपने सपनों को स्थगित कर बच्चों के सपनों को पूरा किया। माँ ने भी अपने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार की जरूरतों में लगा दिया। बीमारी में रात-रात भर जागना, बच्चों की छोटी-सी खुशी पर खिल उठना और कठिन समय में ढाल बनकर खड़ा होना- माता-पिता के प्रेम का कोई आर्थिक मूल्य नहीं हो सकता। इसलिए बुढ़ापे में उनका सबसे बड़ा अधिकार संपत्ति नहीं बल्कि सम्मान और अपनापन है।

वृद्धाश्रमों की बढ़ती जरूरत भी हमें सोचने के लिए मजबूर करती है। हर वृद्धाश्रम बुरी व्यवस्था का प्रतीक नहीं है। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि बुजुर्गों को विशेष देखभाल की आवश्यकता पड़ती है लेकिन जब वृद्धाश्रम इसलिए चुनना पड़े कि अपने ही बच्चों के पास माता-पिता के लिए समय, धैर्य या सम्मान नहीं है, तब समस्या गंभीर हो जाती है। जिस घर को माता-पिता ने अपने खून-पसीने से बसाया, उसी घर से उनका भावनात्मक विस्थापन हमारे पारिवारिक मूल्यों की परीक्षा है।

श्राद्ध का वास्तविक अर्थ केवल अन्न और दान में नहीं बल्कि श्रद्धा में है। श्रद्धा केवल मृतकों के लिए नहीं, जीवित माता-पिता के लिए भी होनी चाहिए। कौवे को भोजन कराना, ब्राह्मण को दान देना और धार्मिक अनुष्ठान करना अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन यदि घर में बैठी माँ भूखी है, पिता दवा के लिए किसी का इंतजार कर रहे हैं और बच्चे उनसे बात करने तक को तैयार नहीं तो हमें अपने धर्म और कर्म के अर्थ पर पुनर्विचार करना चाहिए।

माँ-बाप की सेवा कोई एहसान नहीं है। यह उस ऋण को पूरी तरह चुकाने का प्रयास भी नहीं, जिसे किसी संतान के लिए चुकाना संभव नहीं। यह केवल कर्तव्य है- मानवीय कर्तव्य, पारिवारिक कर्तव्य और नैतिक कर्तव्य। उनके साथ कुछ समय बैठना, उनकी बातें सुनना, उनकी दवाओं का ध्यान रखना, उन्हें सम्मान देना, उनकी पसंद-नापसंद समझना और उनके अकेलेपन को बाँटना- ये छोटे-छोटे काम उनके लिए बहुत बड़ी खुशी बन सकते हैं।

हमें अपने बच्चों को भी यही संस्कार देने होंगे। वे वही सीखेंगे जो हमें करते देखेंगे। यदि बच्चे अपने दादा-दादी और नाना-नानी का सम्मान देखेंगे, तो उनके भीतर भी बुजुर्गों के प्रति संवेदना विकसित होगी।

परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं है; परिवार वह भाव है जहाँ कमजोर पड़ते व्यक्ति को सबसे पहले सहारा मिलता है।

मृत्यु के बाद फूल चढ़ाना आसान है लेकिन जीवन रहते किसी के आँसू पोंछना कठिन। तस्वीर पर माला डालना आसान है लेकिन रोज कुछ मिनट बैठकर माँ-बाप की बातें सुनना सच्ची परीक्षा है। भोज कराने से बड़ा पुण्य यह है कि जीवित माता-पिता को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाए। तीर्थों में भगवान खोजने से पहले घर में मौजूद उन दो चेहरों को पहचानना जरूरी है, जिन्होंने हमारे जीवन को अर्थ दिया।

इसलिए श्राद्ध और पितृपक्ष हमें केवल अपने दिवंगत पूर्वजों की स्मृति न दिलाएँ बल्कि जीवित माता-पिता के प्रति अपने दायित्व का भी बोध कराएँ। पिंडदान से पहले प्रेम का दान हो, कर्मकांड से पहले करुणा हो और श्रद्धा से पहले सेवा हो क्योंकि माँ-बाप के चरणों में केवल तीर्थ नहीं हमारी अपनी जड़ों का संसार बसता है।

जीते जी उन्हें सम्मान दे दिया तो यही सबसे बड़ा श्राद्ध है। जीते जी उनकी आँखों में खुशी ला दी तो यही सबसे बड़ा तर्पण है। और जीते जी उनके अकेलेपन को बाँट लिया तो इससे बड़ा कोई धर्म नहीं।

माँ-बाप को मृत्यु के बाद याद करने से बेहतर है कि उन्हें जीवन रहते महसूस कराया जाए कि वे हमारे लिए कितने अनमोल हैं।