भारतीय ज्ञान परंपरा और एकात्म मानवदर्शन पर जयपुर में मंथन, 300 विद्वानों ने संभाला शोध संवाद
जयपुर, 21 सितंबर । भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा, संस्कृति और समग्र विकास की अवधारणा को केंद्र में रखते हुए जयपुर में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक शोध संगोष्ठी का सोमवार को शुभारंभ हुआ। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का विषय ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय : एकात्म मानवदर्शन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा’ रखा गया है। नूतन सभागार में आयोजित उद्घाटन सत्र में देश-विदेश से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों और शोधार्थियों ने भारतीय चिंतन की समग्र दृष्टि पर विचार साझा किए। संगोष्ठी में करीब 300 प्रतिभागियों ने पंजीयन कराया है।
मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज, प्रकृति और संपूर्ण सृष्टि के बीच संतुलित एवं समन्वित संबंध स्थापित करने वाली दृष्टि है। उनके अनुसार पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन इसी भारतीय चिंतन परंपरा को आधुनिक संदर्भ में समझने और समाज के समग्र विकास की दिशा में आगे बढ़ने का आधार प्रदान करता है। उन्होंने शिक्षा और शोध के माध्यम से भारतीय चिंतन की प्रासंगिकता को वैश्विक स्तर पर सामने लाने की आवश्यकता बताई।
विकास को केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं मानता एकात्म मानवदर्शन
मुख्य वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संगठन मंत्री जे. नंदकुमार ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन और एकात्म मानवदर्शन के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन भारतीय जीवन-दृष्टि की गहरी समझ पर आधारित था। इसमें विकास को केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित न रखते हुए व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास से जोड़कर देखा गया। उन्होंने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता और अंत्योदय जैसे विषयों को भी उनके चिंतन के महत्वपूर्ण पक्षों के रूप में रेखांकित किया।
ऑस्ट्रेलिया से भी जुड़ा भारतीय ज्ञान परंपरा का संवाद
संगोष्ठी में ऑस्ट्रेलिया से ऑनलाइन जुड़ीं सिडनी संस्कृत स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. मीनाक्षी श्रीनिवासन ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक संदर्भ पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि संस्कृत, भारतीय ज्ञान और दर्शन का अध्ययन अब भारत तक सीमित नहीं है तथा विभिन्न देशों में इनके प्रति रुचि बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक आयोजनों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पक्षों पर वैश्विक संवाद को आगे बढ़ाने की बात उन्होंने कही।
दीनदयाल के विचारों को शोध से जोड़ने का प्रयास
पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति के अध्यक्ष प्रो. मोहन लाल छीपा ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन भारतीय समाज की आवश्यकताओं और सांस्कृतिक आधार से जुड़ा हुआ है। 110वीं जयंती के अवसर पर आयोजित यह संगोष्ठी उनके विचारों को अकादमिक और शोध के व्यापक क्षेत्र से जोड़ने का प्रयास है।
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर के प्रभारी निदेशक प्रो. श्रीधर मिश्र ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत और भारतीय दर्शन के अध्ययन-अध्यापन तथा शोध को प्रोत्साहित करना विश्वविद्यालय के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
दो पुस्तकों का विमोचन, सात तकनीकी सत्रों में शोधपत्र
संगोष्ठी के दौरान ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय : एकात्म मानवदर्शन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा’ तथा ‘दीनदयाल उपाध्याय विचारितम् एकात्म मानवदर्शनम्’ पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। पहले दिन सात तकनीकी सत्र आयोजित हुए, जिनमें विभिन्न शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए और विषय विशेषज्ञों ने अकादमिक चर्चा की।
दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन भी सात तकनीकी सत्र होंगे। इनमें एकात्म मानवदर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा, संस्कृति, समाज, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रचिंतन, सामाजिक समरसता और समकालीन संदर्भों जैसे विषयों पर शोधपरक विमर्श जारी रहेगा। इसके बाद समापन समारोह में दो दिनों के शैक्षिक मंथन से सामने आए प्रमुख निष्कर्षों और विचार-विनिमय का सार प्रस्तुत किया जाएगा।
इस संगोष्ठी के माध्यम से आयोजकों का उद्देश्य पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन को भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक संदर्भ में समझना और वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में उसकी शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रासंगिकता पर शोधपरक संवाद को आगे बढ़ाना है। जयपुर में आयोजित यह आयोजन देश-विदेश के विद्वानों को एक साझा मंच पर लाकर भारतीय चिंतन की विभिन्न धाराओं पर संवाद का अवसर प्रदान कर रहा है।









