हक्कानी पर से इनाम हटा: क्यों मजबूर हैं पाकिस्तान, रूस, चीन और अमेरिका बातचीत के लिए?
अफगानिस्तान के तालिबान ने हाल ही में अमेरिका के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है, जिससे न केवल अमेरिकी नागरिक जॉर्ज ग्लेजमैन की रिहाई हुई है, बल्कि इसने दोनों देशों के बीच संबंधों में एक नई दिशा भी दी है। ग्लेजमैन, जो पिछले दो वर्षों से तालिबान के कब्जे में थे, उनकी रिहाई के बदले में अमेरिका ने अफगान गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी पर रखे गए एक करोड़ डॉलर के इनाम को हटा लिया। इस महत्वपूर्ण सौदे में कतर सरकार का अहम योगदान रहा है, जिसने बातचीत को सुगम बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। ग्लेजमैन अमेरिकी नागरिकों की रिहाई का तीसरा मामला बन गए हैं, जिन्होंने जनवरी में रयान कॉर्बेट और विलियम मैकेंटी के साथ अदला-बदली के तहत रिहाई पाई थी।
तालिबान ने इसी क्रम में पाकिस्तान के साथ भी वार्ता की, जिसके फलस्वरूप तोरखम सीमा आखिरकार खोल दी गई। यह सीमा पिछले एक महीने से बंद थी। विशेष रूप से, चीन ने इस वार्ता के दौरान मध्यस्थ की भूमिका निभाई और इसमें तनाव को कम करने में सफलता हासिल की। चीन और तालिबान के बीच की रिश्तों का इतिहास भी काफी महत्वपूर्ण है। चीन ने पहले अफगानिस्तान में अपना राजदूत नियुक्त किया और कई कंपनियों ने काबुल में अपने कार्यालय खोले हैं। इसके अलावा, तालिबान और चीन के बीच साझा हित इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड अल-शाम (आईएसआईएस) के खिलाफ संयुक्त लड़ाई में निहित हैं, जो वर्तमान में अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) के नाम से सक्रिय है।
तालिबान द्वारा चीन के साथ समझौता करने का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तालिबान ने चीनी उइगुरों की गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए तैयार दिखे हैं, जब चीन को जानकारी मिली कि उइगुरों ने अफगानिस्तान के बदख्शान में एक प्रशिक्षण शिविर स्थापित किया है। इसके परिणामस्वरूप तालिबान ने उस शिविर को बंद कर दिया और इस कदम के लिए उन्हें भारी आर्थिक लाभ प्राप्त करने की पेशकश की गई। इन घटनाक्रमों ने तालिबान को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई देश जैसे रूस, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान भी तालिबान से मदद मांगने के लिए प्रेरित हुए हैं।
भारत के लिए भी यह सब घटनाक्रम महत्वपूर्ण हैं। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात में अफगान विदेश मंत्री के साथ महत्वपूर्ण बैठक की है। यह बैठक इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है कि अफगानिस्तान में आईएसआईएस, जिसे ‘इस्लामिक स्टेट-हिंद प्रोविंस’ के नाम से भी जाना जाता है, भारत के लिए भी खतरा बन रहा है। तालिबान ने भारत को सहायता का भरोसा भी दिलाया है।
आईएसकेपी की गतिविधियों ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद के प्रति गंभीर चिंता पैदा की है। आईएसकेपी ने तालिबान पर हमले किए और पाकिस्तान में तालिबान समर्थकों को भी निशाना बनाया। इससे पहले पाकिस्तान ने बलूचिस्तान सूबे से एक आईएसकेपी आतंकवादी को गिरफ्तार कर अमेरिका को सौंपा था, जो काबुल हवाई अड्डे पर अमेरिकी सैनिकों की हत्या में शामिल था। अमेरिका, भारत, पाकिस्तान और चीन के साथ तालिबान के इन नए समझौतों के सफल कार्यान्वयन की संभावना इन देशों को तालिबान को अफगानिस्तान की वैध सरकार के रूप में मान्यता देने के लिए मजबूर कर सकती है।
इन सभी घटनाओं के बीच, तालिबान, चीन और पाकिस्तान के बीच की बढ़ती नजदीकी, उनके साथ-साथ भारत और अमेरिका की चिंताओं को भी रेखांकित करती है। भविष्य में इन देशों के बीच हुए समझौतों और सहयोग का तालिबान के साथ कैसा परिणाम भुगतना पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।









