कांग्रेस की भूख हड़ताल पर बैठे कार्यकर्ता: चंडीगढ़ में बिजली निजीकरण का विरोध, जनता का समर्थन

केंद्र सरकार की ओर से बिजली विभाग के निजीकरण के निर्णय के खिलाफ चंडीगढ़ कांग्रेस द्वारा प्रदर्शन का सिलसिला जारी है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का चिंतन यह है कि यह सरकारी कदम आम जनता के हितों के खिलाफ है और इससे शहरवासियों पर वित्तीय संकट आएगा। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्की ने स्पष्ट तौर पर कहा कि कांग्रेस इस तुगलकी फरमान का विरोध करेगी, चाहे वह सड़क पर हो या विधान में। उनका कहना था कि “केंद्र की मोदी सरकार करोड़ों लाभ में चल रहे बिजली विभाग को मुनाफाखोरों को बेचना चाहती है। इससे न केवल बिजली के बिलों में बढ़ोतरी होगी, बल्कि यह शहर के लोगों के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ बनेगा।”

दूसरे दिन की भूख हड़ताल में शास्त्री मार्केट के विक्रेताओं ने भी कांग्रेस के इस आंदोलन का समर्थन किया। स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस तरह के निजीकरण के निर्णय से उनके प्रत्यक्ष हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। विरोध प्रदर्शनों ने बिजली विभाग के निजीकरण की चर्चा को चंडीगढ़ में और बढ़ा दिया है। अगर यह नीति लागू हुई, तो यह निश्चित रूप से शहरवासियों की जेब पर असर डालेगी और उन्हें अधिक खर्च उठाने के लिए मजबूर कर देगी।

इस भूख हड़ताल के दौरान पार्टी के कई प्रमुख नेता भी शामिल हुए, जिनमें प्रदेश अध्यक्ष हरमोहिंदर सिंह लक्की, उपाध्यक्ष राजीव मोदगिल, महासचिव यादविंदर मेहता और अजय शर्मा, जिला अध्यक्ष राजदीप सिद्धू, ज्वाइंट सेक्रेटरी सोनिया जैसवाल, और सचिव नवदीप सिंह शामिल रहे। इन नेताओं ने एक स्वर में सरकार के इस निर्णय का कड़ा विरोध किया और इसे जनविरोधी बताया। उनके मुताबिक, यह निजीकरण केवल सत्ता में बैठे लोगों के लाभ के लिए किया जा रहा है, जबकि आम लोगों को इससे नुकसान होगा।

भूख हड़ताल के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपना संदेश देने के लिए बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर भी लिए हुए थे, जिनमें लिखा था “बिजली विभाग का निजीकरण नहीं सहेंगे”। कांग्रेस का यह मत है कि सरकारी संपत्तियों का निजीकरण उन्हें बिल्कुल भी स्वीकार नहीं है, और पार्टी इस मुद्दे पर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है। यह आंदोलन न सिर्फ चंडीगढ़ बल्कि अन्य शहरों में भी निजीकरण के खिलाफ एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिससे सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया जा सके।

कांग्रेस का यह प्रदर्शन उम्मीद की किरण के रूप में उभरा है, जो अन्य राजनीतिक दलों और संगठनों को भी इस दिशा में सक्रियता लाने के लिए प्रेरित कर सकता है। लोगों की भावनाओं को समझते हुए, पार्टी ने अपने इस अभियान को मजबूत करने का निर्णय लिया है, ताकि आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर और भी जोरदार आंदोलन किया जा सके।