भारतीयता के लिए राजाओं के योगदान को स्वीकारें राहुल गांधी

भारतीयता के लिए राजाओं के योगदान को स्वीकारें राहुल गांधी

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने हालिया छपे एक लेख को लेकर चर्चा में हैं, वे जब बोलते हैं, तो अक्‍सर कुछ ऐसा बोल देते हैं, कि लोग उनकी आलोचना किए बगैर नहीं रहते, ज‍ब वे लिखते हैं तो उसमें भी वह कुछ ऐसा जरूर लिख देते हैं कि लोगों के बीच नकारात्‍मक अर्थों में वे चर्चा का विषय जरूर बने। अब यह इस देश की मजबूरी हो सकती है कि सभी को उन्‍हें सुनना और पढ़ना पड़ता है, वह इसलिए कि वे केंद्रीय लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में इस वक्‍त नेता प्रतिपक्ष हैं। देश के कई राज्‍यों में उनकी पार्टी मुख्‍य विपक्षी पार्टी है और कुछ में सत्‍ता में है। राहुल का जन्‍म ही सत्‍ता के बीच ऐसे परिवेश और परिवार में हुआ है, जिसे कई दफे ना चाहते हुए भी सुनना हर भारतीय की मजबूरी हो सकती है। इसलिए वे कई बार वह लिख और बोल जाते हैं जो उन जैसे अति महत्‍व के पद पर बैठे हुए व्‍यक्‍ति को शोभा नहीं देता है। क्‍योंकि जो नफरती नैरेटिव वह गढ़ रहे हैं, उसका यदि कभी कहीं कोई नुकसान हुआ तो वह देश को भुगतना पड़ेगा।

इस वक्‍त राहुल गांधी की सर्वत्र चर्चा सुनने को मिल रही है और यह चर्चा कोई सकारात्‍मक संदर्भ में नहीं हो रही, अपने लिखे एक लेख के जरिए उन्‍होंने जिस तरह से देश के राजा-महाराजाओं को कटघरे में खड़ा किया है, उससे इतना तो साफ हो गया है कि उन्‍हें भारतीय इतिहास का बहुत ज्ञान नहीं हैं, अन्‍यथा जो उन्‍होंने अपने लेख में लिखा है वह वे कभी नहीं लिखते। राहुल गांधी ने सभी राजा-महाराजाओं को एक ही श्रेणी में खड़ा कर दिया है, जो पूरी तरह असत्‍य है। भारत की स्‍वाधीनता में कई राजाओं का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है, बल्‍कि स्‍वाधीनता के बाद जिन्‍ना जब भारत की तमाम रियासतों को अपने में मिलाने के लिए उन पर डोरे डाल रहे थे, तब ग्‍वालियर के सिंधिया परिवार समेत कई राज परिवार ऐसे थे, जिन्‍होंने जिन्‍ना को उनका स्‍थान दिखा दिया और कई अन्‍य राजपरिवारों को भारत में सम्‍म‍िलित होने के लिए तैयार किया था। लेकिन राहुल गांधी आज अपने लेख में क्‍या लिख रहे हैं, ‘‘भारत के राजघरानों को ईस्ट इंडिया कंपनी ने चुप करा दिया था। यह अपनी व्यापारिक ताकत से नहीं, बल्कि अपनी पकड़ से चुप करा दिया था। कंपनी ने हमारे अधिक दब्बू महाराजाओं और नवाबों के साथ साझेदारी करके, उन्हें रिश्वत देकर और धमका कर भारत का गला घोंट दिया। इसने हमारे बैंकिंग, व्यापार और सूचना नेटवर्क को नियंत्रित किया। हमने अपनी स्वतंत्रता किसी दूसरे देश के हाथों नहीं खोई; हमने इसे एक एकाधिकारवादी निगम के हाथों खो दिया जो एक दमनकारी तंत्र चलाता था।’’

वास्‍तव में राहुल गांधी आज जहां जो लिख रहे हैं, उस पर गहराई से विचार किया जा सकता है, यह कितना सच है? क्‍या भारत के सभी शासन एक समान थे? परतंत्र होते हुए भी कई जगह इन शासकों ने लगातार अंग्रेजों से लोहा लिया है और यह क्रम सतत 1947 स्‍वाधीनता पूर्व तक यथावत मिलता है। इसके आज कई साक्ष्‍य भी मौजूद हैं, फिर भी क्‍या राहुल गांधी द्वारा किसी गंभीर विषय का सरलीकरण करके सभी को एक समान मानना सही है। स्‍वाधीनता पूर्व के राजा-महाराजा दब्‍बू थे या अपने समय, काल और परिस्‍थ‍ितियों में अति योग्‍य, यह राहुल गांधी आज किस आधार पर तय कर सकते हैं, वह भी एक धारणा सभी के लिए? ऐसे में सोचने में यही आ रहा है कि कल तक ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया कांग्रेस में राहुल गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे, आज उनका यह लेख पढ़ कर ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को यह जरूर लगा होगा कि अच्‍छा हुआ वे कांग्रेस छोड़ आए और आज राहुल गांधी के साथ नहीं खड़े हैं।

उनकी आई यह सख्‍त टिप्‍पणी भी इस ओर ही इशारा करती है, ज्‍योत‍िराद‍ित्‍य सिंध‍िया ने राहुल गांधी के लेख को पढ़कर बोला है, ‘‘नफरत बेचने वालों को भारतीय गौरव और इतिहास पर व्याख्यान देने का कोई अधिकार नहीं है। राहुल गांधी की भारत की समृद्ध विरासत के बारे में अज्ञानता और उनकी औपनिवेशिक मानसिकता ने सभी हदें पार कर दी हैं। यदि आप राष्ट्र के उत्थान का दावा करते हैं तो भारत माता का अपमान करना बंद करें और महादजी सिंधिया, युवराज बीर टिकेंद्रजीत, कित्तूर चेन्नम्मा और रानी वेलु नचियार जैसे सच्चे भारतीय नायकों के बारे में जानें, जिन्होंने हमारी स्वतंत्रता के लिए जमकर लड़ाई लड़ी। स्वयं के विशेषाधिकारों के बारे में आपकी चुनिंदा भूल उन लोगों के लिए अन्याय है, जो वास्तव में प्रतिकूल परिस्थितियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, आपकी असहमति केवल कांग्रेस के एजेंडे को और उजागर करती है, राहुल गांधी आत्मनिर्भर भारत के चैंपियन नहीं हैं, केवल एक पुराने अधिकार के उत्पाद हैं! भारत की विरासत ‘गांधी’ शीर्षक से शुरू या समाप्त नहीं होती है। केवल पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही हमारे असली योद्धाओं की कहानियों का जश्न मनाया जा रहा है! भारत के इतिहास का सम्मान करें या उसके लिए बोलने का दिखावा न करें!’’

देखा जाए तो ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया सही कह रहे हैं, इस संदर्भ में थोड़ा इतिहास भी देख लेना चाहिए, ‘‘जिन्ना राज्यों के विलय के विरोधी थे और उन्होंने कुछ सीमावर्ती राज्यों को पाकिस्तान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए लुभाने की पूरी कोशिश की। एक विशिष्ट मामला जोधपुर के महाराजा और जैसलमेर के महाराज कुमार का था, जिन्हें जिन्ना ने आमंत्रित किया था। बातचीत के दौरान, जिन्ना ने एक खाली कागज पर हस्ताक्षर किए और इसे जोधपुर के महाराजा को देते हुए कहा, ‘आप अपनी सभी शर्तें भर सकते हैं।’ महाराजा को प्रलोभन दिया गया और उन्होंने महाराज कुमार की ओर रुख किया, जिन्होंने जिन्ना से कहा: यदि मेरे राज्यों में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई विवाद होता है तो मैं हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का पक्ष नहीं लूंगा।’ जादू टूट गया, जिन्ना के पास कोई जवाब नहीं था। शासक अपने राज्यों में वापस लौटे और पाया कि उनके सामंत और रईस पाकिस्तान के साथ किसी भी समझौते का हिंसक विरोध कर रहे थे’’(संदर्भ- कांग्रेस संदेश, 06 अक्टूबर 2022, लेख- सरदार पटेल और राज्यों का एकीकरण, कैप्टन प्रवीण डावर)

यहां ये कुछ अन्‍य उदाहरण देखे जा सकते हैं- जीवाजी राव सिंधिया, उन पांच राजाओं में शुमार थे, जिन्होंने सबसे पहले अपनी रियासत का भारत में व‍िलय किया था। वीपी मेनन अपनी किताब ‘स्टोरी ऑफ द इंटीग्रेशन ऑफ इंडियन स्टेट्स’ में लिखते हैं कि ग्वालियर के महाराजा जीवाजी राव ने न सिर्फ सबसे पहले ग्वालियर के विलय का ऐलान किया, बल्कि तमाम दूसरी रियासतों की भारत में विलय में भी मदद की। मेनन आगे लिखते हैं कि जीवाजी राव ने दिसंबर 1946 में ऐलान कर दिया था कि वह एक जिम्मेदार सरकार के साथ खड़े रहेंगे और आजादी से 3 महीने पहले मई 1947 में ही आंतरिक सरकार और संविधान सभा को समर्थन की घोषणा की थी। यह एक तरीके से सरकार, विशेषकर सरदार पटेल के लिए राहत की बात थी। क्योंकि रियासतों के एकीकरण का जिम्मा पटेल के ही कंधों पर था। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो करीब 500 देशी रियासतों ने पंडित नेहरू की अगुवाई वाली सरकार को भारत के विकास के लिए 74 करोड़ रुपये दान दिए। दूसरी तरफ ग्वालियर राजघराने के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने अकेले 54 करोड़ रुपए दान दिए थे। यही नहीं, उन्होंने सरकारी दफ्तर बनाने के लिए तमाम बेशकीमती बिल्डिंग और जमीन भी दान दी थी। स्‍वतंत्रता के बाद देश की संसद में तमाम स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें लगाई गईं, जिसमें सरदार पटेल का चित्र भी शामिल है। संसद में वल्लभभाई पटेल की जो आदमकद तस्वीर लगी है, वह जीवाजी राव सिंधिया ने गिफ्ट की थी। स्‍वाधीनता के बाद देसी रियासतों के भारत में विलय के बाद राजा, महाराजा और निजाम आदि का दर्जा तो खत्म हो गया, लेकिन ग्वालियर राजघराने की लोकप्रियता को देखते हुए सरकार ने जीवाजी राव सिंधिया को राजप्रमुख का दर्जा दिया। ग्वालियर के जय विलास पैलेस में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में खुद पंडित नेहरू ने जीवाजी राव सिंधिया को शपथ दिलाई थी।

जिन डॉ. भीमराव आम्‍बेडकर का नाम संविधान निर्माता के रूप में बहुत सम्‍मान से लिया जाता है, यदि उनकी मदद करने एक महाराजा आगे नहीं आते, तो शायद आज उनका कोई उस रूप में नाम ही नहीं ले रहा होता और ना ही उनकी प्रतिभा कभी सभी के समक्ष आ सकती थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर को विदेश में पढ़ाई करने में मदद बड़ौदा के महाराजा सायाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने की थी। महाराजा ने आम्‍बेडकर को विदेश में रहने का भी प्रबंध किया था। उन्‍होंने ने ही आम्‍बेडकर को “बाबा साहेब” की उपाधि दी थी। ज्योतिबा फुले, दादाभाई नौरोजी, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविंद समेत कई हस्तियों को महाराजा सायाजीराव ने आर्थिक मदद दी थी। इसके साथ ही राज्य में लड़कियों के शिक्षा पर ध्यान देते हुए कई स्कूल खोले और प्राइमरी शिक्षा मुफ्त करने के साथ अनिवार्य कर दी।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मिथिला के दरभंगा राज परिवार के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने अपने जीवनकाल के दौरान कांग्रेस के पोषण के लिये बहुत योगदान दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान 1892 में जब कांग्रेस अपना अधिवेशन इलाहाबाद में रखना चाहती थी, तब सरकार ने उन्हें किसी सार्वजनिक स्थान का प्रयोग करने से मना कर दिया था, तब महाराजा ने जमीन खरीद कर उसे कांग्रेस को अपना वार्षिक अधिवेशन करने के लिये दे दिया था। अतः कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन 1892 में लोथर कैसल के मैदान में आयोजित किया गया था। इस प्रकार महाराजा ने स्वतंत्रता संग्राम को हर तरीके से आर्थिक एवं नैतिक मदद पहुँचाने की कोशिश की। लक्ष्मेश्वर सिंह के लाभार्थियों में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अबुल कलाम आजाद, सुभाष चन्द्र बोस एवं महात्मा गाँधी जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के दिग्गज शामिल थे।

स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर, 1893 को शिकागो में विश्व धर्म महासभा में भाषण दिया था, उनका यह भाषण आज भी ऐतिहासिक माना जाता है और भारतीय सनातन धर्म एवं संस्‍कृति की द्गपताका फहराता है। वास्‍तव में डॉ. आम्‍बेडकर की तरह ही स्‍वामी जी का इस धर्म संसद में वक्‍तव्‍य देने की मंशा भी संभवत: अधूरी रह जाती और जो स्‍वामी एक सूर्य की भांति चमके एवं पूरे विश्‍व पर एक पल में ही भारतीय ज्ञान का प्रभाव छा गया, यह श्रेष्‍ठ कार्य पूर्ण नहीं हो पाता यदि खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह ने स्वामी विवेकानंद को शिकागो जाने में मदद न की होती। वे अजीत सिंह ही थे, जिन्‍होंने विवेकानंद को वित्तीय सहायता दी थी। उन्होंने ही विवेकानंद को शिकागो में विश्व धर्म संसद में बोलने के लिए प्रोत्साहित किया था। अजीत सिंह ने ही विवेकानंद को ‘विवेकानंद’ नाम सुझाया था, इसका मतलब है, “विवेकपूर्ण ज्ञान का आनंद।”

बीएचयू की स्थापना साल 1916 में हुई थी, इसकी स्थापना में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ ही दरभंगा राज के महाराजा रामेश्वर सिंह और नारायण वंश के प्रभु नारायण सिंह और आदित्य नारायण सिंह का योगदान रहा था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के लिए ज़मीन काशी नरेश प्रभु नारायण सिंह ने दान की थी। इसी प्रकार से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के लिए जमीन देने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे। 1857 का प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम तो पूरा का पूरा ही तत्‍कालीन राजा-रानी, महाराजों के सहयोग से अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा गया था। अत: ऐसे एक नहीं अनेकों नाम राजा-रानी, राजकुमार-राजकुमारियों के भारतीय इतिहास में ज्ञात हैं, जिन्‍होंने कभी भी अंग्रेजों के अधिनायकवाद का समर्थन नहीं किया । तत्‍कालीन परिस्‍थ‍ितियों में अपने राज्‍य की जनता के हित को देखते हुए जो समझौते करने पड़े, वह किए अवश्‍य, लेकिन जरूरी नहीं कि सब के सब राजा-महाराजा उन अनुबंधों से सहमत ही थे। इस पर भी उनका ध्‍यान अपने राज्‍य की जनता का पूरी तरह से हित चिंतन एवं उसके लिए कार्य करते रहने में ही बीता है।

राहुल गांधी को ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की तरह ही भारत के राज परिवारों में शुमार होने वाले विक्रमादित्य के द्वारा बहुत सटीक जवाब मिला है। वे कहते हैं, ‘‘यह लेख राहुल गांधी की इतिहास की सतही समझ को दर्शाता है। महाराजाओं के योगदान और भूमिका को ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रति केवल “प्रशंसक” तक सीमित नहीं किया जा सकता है। कई महाराजाओं को शासन करने के लिए तैयार राज्य नहीं सौंपे गए थे, बल्कि उनकी शुरुआत साधारण मूल के किसानों और सैनिकों से हुई थी, जिन्होंने अपने क्षेत्रों और बाद के राज्यों को बनाने के लिए कड़ी मेहनत की और कई लड़ाइयां लड़ीं।’’ विक्रमादित्य सिंह ने उदाहरण देते हुए लिखा, ‘‘महाराजा गुलाब सिंह ने एक पैदल सैनिक के रूप में शुरुआत की और अपनी सेना का नेतृत्व किया। उन्होंने अंततः भारत को जम्मू, कश्मीर और लद्दाख राज्य का उपहार देने के लिए अपने खून और जीवन का बलिदान दिया। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह 1930 में ब्रिटिश राजधानी लंदन में गोलमेज सम्मेलन में स्वतंत्र भारत की मांग को उठाने वाले पहले व्यक्ति थे।’’ राजस्थान की उपमुख्‍यमंत्री दिया कुमारी ने भी राहुल गांधी को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें वे कहती हैं, ‘‘मैं आज एक संपादकीय में भारत के पूर्व शाही परिवारों को बदनाम करने के राहुल गांधी के प्रयास की कड़ी निंदा करती हूं। एकीकृत भारत का सपना भारत के पूर्व राजपरिवारों के सर्वोच्च बलिदान के कारण संभव हो सका है, ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों की आधी-अधूरी व्याख्या के आधार पर लगाए गए निराधार आरोप पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं।’’

—————