फाजिल्का किसान डीसी से मिले: मदद नहीं मिली तो पराली खेत में ही जलाएंगे!
धान की पराली जलाने का मुद्दा इस समय एक प्रमुख चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रशासन और सरकार की ओर से लगातार किसानों से अपील की जा रही है कि वे अपने खेतों में धान की बची-खुची पराली को न जलाएं। हालांकि, किसानों का कहना है कि जब तक उन्हें आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। वे सच्चाई से अवगत कराते हैं कि आर्थिक दबाव के कारण उन्हें पराली जलाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
हाल ही में फाजिल्का के जिलाधिकारी के पास एक ज्ञापन सौंपने के लिए भाकियू एकता उगराहा के किसान जगसीर सिंह ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि सरकार और प्रशासन द्वारा उन्हें दिया गया निर्देश कि वे पराली न जलाएं, यथार्थ से बहुत दूर है। किसानों ने यह मांग की है कि सरकारी सहकारी समितियों को बेलर (पराली की कटाई के लिए मशीन) उपलब्ध कराए जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि धान की पराली खरीदने वाली बड़ी कंपनियों ने खरीद दर में कटौती कर दी है, जिससे किसानों का लाभ गिर गया है।
किसानों का यह भी कहना है कि प्रति एकड़ 5 हजार रुपये की मदद आवश्यक है, ताकि वे पराली उठाने का खर्च बर्दाश्त कर सकें। वे लगातार मांग कर रहे हैं कि सरकार उन्हें प्रति एकड़ 4,000 से 5,000 रुपये का आर्थिक सहायता प्रदान करे। इसके अलावा, किसानों ने चिंता व्यक्त की कि जिन्हें मशीनरी की आवश्यकता नहीं है, वे लोग भी इसे हासिल कर रहे हैं, जबकि यह उन किसानों के लिए जरूरी है जो वास्तव में इससे लाभान्वित हो सकते हैं। उन्होंने इस संदर्भ में प्रशासन से जांच करने का आग्रह किया है।
किसानों का कहना है कि अगर समय पर बेलर नहीं दिए जाते, डंपिंग स्थलों का निर्माण नहीं किया जाता और बिक्री प्रक्रिया को सुचारू रूप से नहीं चलाया जाता, तो फिर धान की पराली जलाने का मुद्दा एक गंभीर समस्या में परिवर्तित हो जाएगा। यदि किसानों की जरूरतों को नजरअंदाज किया जाता है, तो वे मजबूरन पराली को आग लगाने के लिए बाध्य होंगे। यह कदम न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि इससे उनके आर्थिक स्थिरता पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धान की पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल जागरूकता बढ़ाने से नहीं होगा, बल्कि इसे एक समग्र दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। सरकार को किसानों की वित्तीय स्थिति को समग्र रूप से सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। किसान संगठनों की मांगों पर ध्यान देने और उच्च स्तर पर उनकी समस्याओं का समाधान करने से ही यह विवाद समाप्त हो सकता है, जिससे स sustainable और पर्यावरण के अनुकूल कृषि प्रथाओं को बढ़ावा दिया जा सकेगा।









