delhi-hc-dmrc-supreme-court-metro

डीएमआरसी ने सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का नाम बदले जाने का किया विरोध

नई दिल्ली, 19 फ़रवरी । दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन (डीएमआरसी) ने सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर सर्वोच्च न्यायालय करने की मांग का विरोध करते हुए कहा है कि इससे सार्वजनिक राजस्व पर बोझ बढ़ेगा। डीएमआरसी ने दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा कि अगर ये मांग मानी गयी तो कई दूसरी याचिकाएं दायर की जाएंगी और दिल्ली मेट्रो पर काफी बोझ बढ़ जाएगा। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की अगली सुनवाई 24 अप्रैल को करने का आदेश दिया।

सुनवाई के दौरान डीएमआरसी के वकील ने कहा कि फिलहाल अंग्रेजी और हिंदी में मेट्रो स्टेशन का नाम सुप्रीम कोर्ट लिखा हुआ है। डीएमआरसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट मेट्रो का नाम बदलकर सर्वोच्च न्यायालय करने से सार्वजनिक धन का करीब 40 से 45 लाख रुपये का खर्च होगा। उन्होंने कहा कि मेट्रो स्टेशनों का नाम बदलना एक नीतिगत फैसला है। डीएमआरसी ने कहा कि अगर एक मेट्रो स्टेशन का नाम बदलने की अनुमति दी जाएगी, तो ऐसी ही कई मेट्रो स्टेशन का नाम बदलने के लिए याचिकाएं दायर की जाएंगी। तब कोर्ट ने कहा कि कई याचिकाएं दायर होने की आशंका इस मांग को खारिज करने की वजह नहीं हो सकती।

उच्च न्यायालय ने 11 फरवरी को याचिका पर सुनवाई करते हुए डीएमआरसी को नोटिस जारी किया था। याचिका वकील उमेश शर्मा ने दायर किया है। याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का नाम हिन्दी में सर्वोच्च न्यायालय रखा जाए। याचिका में कहा गया है कि सेंट्रल सेक्रेटेरियट मेट्रो स्टेशन का नाम हिन्दी में केंद्रीय सचिवालय और दिल्ली यूनिवर्सिटी मेट्रो स्टेशन का नाम हिन्दी में दिल्ली विश्वविद्यालय है। उसी तरह सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर सर्वोच्च न्यायालय रखा जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक वेबसाइट पर इसका हिन्दी में नाम भारत का सर्वोच्च न्यायालय है।

याचिका में कहा गया है कि आफिशियल लैंग्वेज एक्ट और उसके नियम के मुताबिक केंद्रीय विभागों के सभी साइन बोर्ड अंग्रेजी और हिन्दी में होने चाहिए। हिन्दी में नाम देवनागरी लिपि में लिखा होना चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने दिल्ली मेट्रो को मेट्रो स्टेशन का नाम सुप्रीम कोर्ट रखने का सुझाव भेजा और वो मेट्रो प्रशासन के पैनल की ओर से स्वीकार कर लिया गया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि हिन्दी में अनुवाद करने में विभाग काफी आलसी हैं। वे गृह मंत्रालय जा सकते थे। एक राजभाषा विभाग भी है। अगर उन्हें कोई समस्या है तो वे इसका अनुवाद करा सकते थे, लेकिन वे हिन्दी भाषा को खराब कर रहे हैं।