घुसपैठ का गहराता संकट, ग्वालियर की घटना से बड़ा सबक लेने की जरूरत

मध्यप्रदेश के ग्वालियर से हाल ही में सामने आया बांग्लादेशी नागरिकों का मामला एक पुलिस कार्रवाई भर नहीं है; यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, जनसंख्या संतुलन और प्रशासनिक चौकसी पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। महाराजपुरा एयरबेस जैसे संवेदनशील क्षेत्र के पास बिना वैध दस्तावेजों के बारह वर्षों तक आठ बांग्लादेशी नागरिकों का रहना इस ओर संकेत करता है कि अवैध विदेशी घुसपैठ सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रही, अब यह देश के भीतर गहराई तक फैल चुकी है।

गुजरात में सबसे बड़ी कार्रवाई अप्रैल 2025 में हुई, जब सूरत और अहमदाबाद से हजारों संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने पाया कि ये लोग वर्षों से फर्जी पहचान पत्रों और किरायेदारी के आधार पर रह रहे थे। हरियाणा के गुरुग्राम में भी सैकड़ों अवैध घुसपैठियों को पकड़ा गया, जिनमें बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक शामिल थे। दिल्ली में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। उत्तर-पश्चिम दिल्ली, वजीरपुर और दिल्ली कैंट इलाकों में पुलिस ने कई बांग्लादेशी परिवारों को पकड़ा, जो एक दशक से अधिक समय से बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे थे। इनसे बरामद मोबाइल डेटा और पहचान पत्रों ने जांच एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में 90 बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए, जिनमें 22 बच्चे शामिल थे। ये सभी ईंट भट्टों पर मजदूरी कर रहे थे और फर्जी नामों से स्थानीय ठेकेदारों के अधीन कार्यरत थे। वहीं, असम के करीमगंज जिले में पुलिस ने छह बांग्लादेशी घुसपैठियों को गिरफ्तार कर वापस सीमा पार भेजा।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के रानीनगर और एलागुला इलाकों से आठ बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए, जो अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए थे। त्रिपुरा में भी पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने संयुक्त कार्रवाई में 16 बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया। ये सभी लोग मनोपुर और सेपाहीजाला क्षेत्रों में पकड़े गए।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि बांग्लादेशी घुसपैठ अब असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल जैसे पारंपरिक प्रवेश मार्गों से आगे बढ़कर देश के औद्योगिक और शहरी इलाकों तक पहुंच चुकी है। गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश दक्षिण भारत के राज्यों में इनकी मौजूदगी ने यह संकेत दिया है कि आर्थिक अवसरों और ढीली प्रशासनिक निगरानी ने इस अवैध प्रवासन को और बढ़ावा दिया है।

हरियाणा पुलिस की सूचना पर ग्वालियर में हुई कार्रवाई बताती है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों का नेटवर्क पूर्वोत्तर राज्यों के साथ हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत के राज्‍य और अब मध्यप्रदेश तक पहुंच चुका है। पानीपत में गिरफ्तार कुछ बांग्लादेशी नागरिकों की निशानदेही पर जब पुलिस ग्वालियर पहुँची, तो महाराजपुरा क्षेत्र से आठ लोगों को पकड़ा गया। जांच में खुलासा हुआ कि सभी बांग्लादेश के निवासी हैं, जो वर्षों से मजदूरी के बहाने भारत में रह रहे थे। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।

वस्‍तुत: देखा जाए तो यह मामला कानून तोड़ने तक सीमित नहीं है; यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। एयरबेस जैसे सामरिक महत्व के क्षेत्र में विदेशी नागरिकों का रहना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। पुलिस को इनके मोबाइल फोन से कई संदिग्ध संपर्क मिले हैं, जिनकी जांच एटीएस और आईबी जैसी एजेंसियां कर रही हैं। यह आशंका निराधार नहीं कि ऐसे लोग स्थानीय सूचनाएं जुटाकर विदेशी नेटवर्क तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हों।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि इतने वर्षों तक किसी एजेंसी को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? स्थानीय लोगों का कहना है कि ये परिवार मजदूरी करते थे, किराए पर रहते थे और किसी को शक नहीं हुआ। यह दर्शाता है कि किरायेदारी सत्यापन प्रणाली और स्थानीय पुलिस निगरानी व्यवस्था कमजोर है। देश के अधिकांश शहरों में हजारों लोग बिना किसी दस्तावेज या पहचान पत्र जांच के किराए पर रह रहे हैं। यह स्थिति ग्वालियर तक सीमित नहीं है, आज ये एक राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है।

गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ समय पहले कहा था कि “विदेशी इस्लामी घुसपैठ भारत की जनसंख्या में असंतुलन पैदा कर रही है।” ग्वालियर की घटना इस कथन को और प्रासंगिक बनाती है। भारत में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बांग्लादेशी, म्यांमार और पाकिस्तान मूल के नागरिकों की संख्या को लेकर वर्षों से विवाद बना हुआ है। सरकारी और स्वतंत्र अध्ययनों में आंकड़े भिन्न हैं, 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 30 लाख बांग्लादेशी मूल के लोग पाए गए थे, जबकि बाद के वर्षों में कुछ रिपोर्टों ने यह संख्या एक से दो करोड़ तक बताई।

भारत-बांग्लादेश सीमा लगभग 4,100 किलोमीटर लंबी है, जो विश्व की सबसे लंबी खुली सीमाओं में गिनी जाती है। यह सीमा नदियों, दलदली इलाकों और जनजातीय क्षेत्रों से होकर गुजरती है, जिससे निगरानी कठिन हो जाती है। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के प्रयासों के बावजूद हर वर्ष हजारों लोग अवैध रूप से सीमा पार करते हैं। गृह मंत्रालय के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में लगभग पाँच हजार बांग्लादेशी नागरिकों के घुसपैठ प्रयासों को रोका गया है, परंतु जितने पकड़े जाते हैं, उनसे कहीं अधिक लोग अंदर पहुंच जाते हैं।

समस्या यह है कि वर्षों तक रहकर ये “अदृश्य नागरिक” बन जाते हैं। पहचान पाना कठिन हो जाता है कि कौन वास्तविक भारतीय है और कौन अवैध प्रवासी। असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया के दौरान यह चुनौती स्पष्ट रूप से सामने आई। हजारों घुसपैठिए उसमें शामिल पाए गए। जिसे लेकर अब तक विवाद बना हुआ है। कुल मिलाकर अवैध प्रवासन देश की जनसंख्या, रोजगार और संसाधनों पर गहरा दबाव डाल रहा है। सीमावर्ती राज्यों जैसे असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में पिछले चार दशकों में जनसांख्यिकीय संतुलन में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। कई स्थानों पर इससे सामाजिक असंतोष, आंदोलन और हिंसा तक की स्थिति बनी। यह सांख्यिकीय नहीं, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है।ग्वालियर की घटना ने दिखाया है कि थोड़ी सी लापरवाही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

गृहमंत्री अमित शाह का यह कहना प्रासंगिक है कि अवैध घुसपैठ कानून-व्यवस्था का नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसंख्या नीति का प्रश्न है। यदि इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह संसाधन-संघर्ष और सामाजिक असंतुलन की गंभीर चुनौती बन सकता है। ग्वालियर की घटना ने देश को यह सिखाया है कि अवैध प्रवासन अब सीमा पार का नहीं, घर के भीतर का मुद्दा बन चुका है। यदि इतने संवेदनशील क्षेत्र में विदेशी नागरिक वर्षों तक बिना जांच के रह सकते हैं, तो यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को उजागर करता है।

अब समय है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक समग्र राष्ट्रीय नीति बनाएं, जिसमें सीमा नियंत्रण, नागरिकता सत्यापन, कानूनी प्रवर्तन और मानवीय दृष्टिकोण का संतुलित समावेश हो। भारत की ताकत उसकी विविधता और सह-अस्तित्व में है, पर यह तभी सुरक्षित रह सकती है जब हम अपने सीमांत, नागरिक पहचान और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करें। ग्वालियर की घटना एक चेतावनी है यदि हमने समय रहते सबक नहीं लिया, तो इसकी कीमत एक शहर नहीं, पूरा राष्ट्र चुकाएगा, इतना तो तय ही है। यहां निष्‍कर्ष यही है कि सावधानी में देश की सुरक्षा निहित है, अब सावधान हम सभी को होना है और यदि कहीं भी हमारे आसपास किसी पर शक हो रहा है तो हम पुलिस को सूचना अवश्‍य दें।