साध्वी प्राची की चौंकाने वाली मांग: पुरुष आयोग की क्यों है जरूरत? तथ्य करेंगे हैरान!
साध्वी प्राची ने हाल ही में मेरठ में हुए सौरभ हत्याकांड को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया। इस बयान के बाद पुरुष आयोग बनाने की मांग एक बार फिर से सुर्खियों में आ गई। साध्वी प्राची एक कार्यक्रम में शरीक होने आई थीं। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने पतियों के हत्याकांडों का संदर्भ देते हुए कहा कि यह पूरे समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने न्याय की व्यवस्था के लिए पुरुष आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया और इसे स्थापित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर पहल करने की बात कही। साध्वी प्राची ने पश्चिमी संस्कृति पर भी आरोप लगाया, जिससे उन्होंने कहा कि आजकल लड़कों का हनन अधिक हो रहा है।
साध्वी प्राची का कहना था कि पहले महिलाएं समाज में अधिक उत्पीड़ित होती थीं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और पुरुषों को भी अत्याचार का शिकार होना पड़ रहा है। उन्होंने इस बदलाव का श्रेय पश्चिमी संस्कृति को दिया और कहा कि पश्चिमी यूपी में ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ये सब सामाजिक मीडिया पर हो रहे रील्स की दिशा में बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। उनका यह भी मानना है कि समाज में स्थिति को समझने और सुधारने के लिए पुरुषों की आवाज का समावेश आवश्यक है।
हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश में ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं, जिसमें पुरुषों ने पत्नी द्वारा प्रताड़ित होने के कारण आत्महत्या का रास्ता चुना। इटावा की घटना में इन्जीनियर मोहित यादव ने अपनी पत्नी और उसके परिवार पर आरोप लगाते हुए आत्महत्या की, जिससे उनकी मानसिक स्थिति का स्पष्ट चित्रण मिलता है। इसी प्रकार गाजियाबाद में भी एक आईटी इंजीनियर ने अपने जीवन को समाप्त कर लिया, जिसके पीछे पत्नी से आने वाली प्रताड़ना का हवाला दिया गया। ये घटनाएं स्पष्ट संकेत देती हैं कि पुरुषों के योगदान और उनकी समस्याओं की अनदेखी की जा रही है, जिसके लिए साध्वी प्राची ने पुरुष आयोग बनाने की मांग की है।
पुरुष आयोग की मांग को लेकर पिछले एक दशक में देशभर में कई संगठन सक्रिय रहे हैं। इन संगठनों ने समय-समय पर प्रदर्शन और सत्याग्रह भी आयोजित किए हैं, जैसे हाल ही में सेव फैमिली फाउंडेशन ने जंतर-मंतर पर अपने अधिकारों की मांग की। 2023 में, पुरुष आयोग की स्थापना के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई, लेकिन कोर्ट ने इसे सुनवाई से इन्कार कर दिया। न्यायालय का कहना था कि इस मामले में व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है ताकि यह समझा जा सके कि ऐसा आयोग क्यों बनाया जाए।
आ statistics के अनुसार, 2021 में 1,64,033 लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें विवाहित पुरुषों की संख्या आधी से अधिक थी। यह मुद्दा महज व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की जरूरत को दर्शाता है। मनोचिकित्सकों ने बताया कि पुरुषों को बचपन से ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में कठिनाई होती है, जिसके परिणामस्वरूप वे मानसिक रूप से बेहद कमजोर हो जाते हैं। इससे साफ होता है कि पुरुषों की समस्याओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है और उन्हें मदद की आवश्यकता है।
इस संदर्भ में कानून भी पुरुषों को न्याय प्रदान करने में असमर्थ दिखता है। घरेलू हिंसा के कानून के अंतर्गत केवल महिलाएं और बच्चे ही शिकायत दर्ज कर सकते हैं, जो कि पुरुषों के लिए एक बड़ी बाधा है। समाज में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि पुरुष भी अपनी समस्याएं व्यक्त कर सकें और न्याय पा सकें।
इस प्रकार की स्थिति को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि पुरुष आयोग की स्थापना की मांग अब सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक न्याय की एक आवश्यकता बन गई है।









