राजस्थान में 8 साल अवैध प्रैक्टिस, अब बने मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रार: जांचेंगे डॉक्टर्स के लाइसेंस!

राजस्थान में स्वास्थ्य क्षेत्र का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें एक ऐसे व्यक्ति की पहचान हुई है, जो लगभग 8 वर्षों से अवैध रूप से चिकित्सकीय सेवाएं प्रदान कर रहा था। यह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि राजस्थान मेडिकल कौंसिल (RMC) के कार्यवाहक रजिस्ट्रार, डॉ. गिरधर गोयल हैं। उनका खुद का रजिस्ट्रेशन 27 अप्रैल 2016 को समाप्त हो गया था, लेकिन उन्होंने इसे रिन्यू करने में काफी देर की, जो कि 6 फरवरी 2024 में संभव हुआ। इस अवधि में वे जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में और अन्य चिकित्सा विभागों में काम करते रहे, जहां उन्होंने कई मरीजों का इलाज किया, इसके साथ ही अपने निजी क्लिनिक पर भी प्रैक्टिस जारी रखी।

विशेषज्ञों के अनुसार, बिना वैध लाइसेंस के प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों के अनुसार ‘झोलाछाप डॉक्टर’ की श्रेणी में रखा जाता है। यह स्थिति तब और गंभीर हो गई जब हाल ही में भजनलाल की सरकार के कैबिनेट के सक्रिय होने के बाद RMC में कार्यवाहक रजिस्ट्रार के पद के लिए एक फाइल चली, जिनमें डॉ. गोयल का नाम सर्वोपरि था। लेकिन जैसे ही मंत्री स्तर पर रिपोर्ट आई, यह स्पष्ट हुआ कि उनका लाइसेंस पिछले 8 साल से रिन्यू नहीं हुआ है। इसके परिणामस्वरूप, आखिरी क्षण में डॉ. राजेश शर्मा को कार्यवाहक रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया।

जैसे ही यह मामला प्रकाश में आया, डॉ. गोयल ने तुरंत अपने लाइसेंस को रिन्यू करने के लिए आवेदन किया। RMC ने उन्हें एक हजार रुपए की पेनल्टी भी लगाई और उनके लाइसेंस को 27 अप्रैल 2026 तक के लिए रिन्यू किया। यह सब तब हुआ जब दैनिक भास्कर ने RMC के भीतर फर्जी रजिस्ट्रेशन के मामलों की खोजबीन की थी, जिसमें पाया गया था कि 98 डॉक्टरों के लिए फर्जी रजिस्ट्रेशन किए गए थे। इसमें कार्यवाहक रजिस्ट्रार की भूमिका संदिग्ध रही थी, जिससे स्वास्थ्य विभाग के नियमों पर सवाल उठे हैं।

पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. के.के. शर्मा का कहना है कि किसी भी डॉक्टर को प्रैक्टिस करने के लिए RMC में रेजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य है, चाहे वह किसी भी स्तर का हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना रजिस्ट्रेशन के डॉक्टर होना एक गंभीर अपराध है। वहीं, वर्तमान स्वास्थ्य निदेशक डॉक्टर रवि प्रकाश शर्मा ने बताया कि वे अभी सरकार द्वारा RMC के अध्यक्ष का कार्यभार नहीं संभाल रहे हैं, लेकिन नियमों के अनुसार, बिना रजिस्ट्रेशन के प्रैक्टिस करना गंभीर दंड का विषय है।

राजस्थान का मेडिकल विभाग पहले से ही विवादों से घिरा हुआ है, और इससे पहले डॉ. धनंजय अग्रवाल के मामले ने भी चर्चा का विषय बना था। उन्हें कार्यवाहक वीसी के पद पर नियुक्त किया गया था, लेकिन बाद में सलेक्शन कमेटी ने उन्हें इंटरव्यू के लिए अयोग्य घोषित किया। यह घटनाक्रम यह दर्शाता है कि सरकार ने उन्हें इतने लंबे समय तक इस पद पर क्यों रखा, जबकि नियम के अनुसार कार्यवाहक वीसी के लिए अधिकतम 5 से 6 महीने का कार्यकाल निर्धारित है।

इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि राजस्थान में स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है, ताकि ऐसी अव्यवस्थाएं और अनियमितताएं भविष्य में न हों। यह मामला न केवल चिकित्सा क्षेत्र की छवि पर प्रश्न चिन्ह लगाता है, बल्कि इससे मरीजों की सुरक्षा भी प्रभावित होती है।