पंजाबी संस्कृति की झलक दिखाता ‘लोहा कुट’ का सेट, ग्रामीण जिंदगी का अनोखा समावेश!

शनिवार की शाम को पंजाब नाटशाला के मंच पर पंजाबी नाटक ‘लोहा कुट’ का बेहतरीन प्रदर्शन हुआ। इस नाटक का निर्देशन मंचप्रीत ने किया है और इसे प्रसिद्ध टीचर और नाटककार बलवंत गार्गी द्वारा 1944 में लिखा गया था। ‘लोहा कुट’ नाटक के सेट में ग्रामीण जीवन और पंजाबी संस्कृति की अद्भुत झलक देखने को मिलती है। यह नाटक वर्तमान समय में सजीवता और वास्तविकता के साथ दर्शकों के सामने आया, जहां आजकल ऐसी तस्वीरें केवल प्रदर्शनों या माध्यमों से देखने को मिलती हैं।

नाटक की कहानी संती नामक एक महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने मन में छिपे जज्बातों को भुलाकर लोहार काकू के साथ रहने लगी है। संती की बड़ी बेटी बैणो, जो घर के कठोर माहौल के खिलाफ विद्रोह करती है, अपने पिता को चुनौती देते हुए सरबण के साथ घर से भाग जाती है। संती, अपनी बेटी के इस निर्णय को सामाजिक पाप मानती है और चंडी देवी की तरह गर्जती है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी सोच बदलने लगती है। उसे यह एहसास होता है कि बैणो का निर्णय सही था, क्योंकि उसने अपनी इच्छाओं के अनुसार जिया है।

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, संती के दिल में दबी आग फिर से जागने लगती है। वह महसूस करती है कि समाज और परिवार के बंधन उसके लिए कितने झूठे और निरर्थक हैं। इसीलिए वह भी काकू के कठोरता के खिलाफ विद्रोह करती है और गज्जण के साथ भाग जाती है। नाटक ‘लोहा कुट’ में प्रस्तुत घटनाक्रम केवल इस परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक रिश्तों और भावनाओं की दरिद्रता का प्रतीक भी है।

इस नाटक में कई प्रतिभाशाली कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को जीवंत किया। मंचप्रीत, मंदीप घर्इ, कविता, रजनी दुग्गल, सरुचि, कोमलप्रीत, संधु, गुरप्रीत कौर, जगदीश, जगप्रीत, मोहित, संदीप, सुधाशु, सुनील, सिकंदर, जय मनचंदा, आगाजप्रीत और हरमन ने अपने अभिनय से मंच पर जादू बिखेरा। नाटक के समापन पर सभी कलाकारों को नाटशाला प्रबंधन की ओर से प्रसिद्ध नाटककार जतिंदर बराड़ द्वारा सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया गया, जो उनके श्रम और समर्पण को मान्यता देता है।

इस प्रकार, ‘लोहा कुट’ नाटक ने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई और सामाजिक मुद्दों पर गहरी सोचने के लिए प्रेरित किया। यह नाटक न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह सामाजिक रिश्तों, चुनौतियों और संघर्षों को उजागर करने का माध्यम भी है। ऐसे नाटकों का मंचन पंजाब की संस्कृति और कला को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।