लखनऊ सफाई संकट: मेयर-पार्षद विवाद से मोहल्लों में बदबूदार माहौल, कंपनी पर उठा सवाल
लखनऊ नगर निगम में सफाई ठेकों को लेकर चल रहे विवाद ने शहर की स्वच्छता व्यवस्था को गंभीर खतरे में डाल दिया है। नगर निगम के मेयर और पार्षदों के बीच की आपसी तकरार ने शहर के 110 वार्डों में कचरा उठाने और सफाई की सुविधा को क्रिटिकल स्थिति में पहुंचा दिया है। जगह-जगह कचरे के ढेर लगे होने के कारण नागरिकों को चिंताजनक हालात का सामना करना पड़ रहा है। बुरी स्थिति के चलते नहीं केवल स्थानीय निवासियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि स्वच्छता सर्वेक्षण में लखनऊ की रैंकिंग भी प्रभावित हो सकती है। इस पूरे मामले पर दैनिक भास्कर ने नगर निगम अधिकारियों के दावों के विपरीत वास्तविकता का निरीक्षण किया, जिसमें पाया गया कि क्षेत्रों में सफाई की स्थिति बेहद दयनीय है।
व्यवस्था के जमीनी स्तर पर जाकर देखा गया तो स्थिति और भी चिंताजनक प्रतीत होती है। जैसे, अयोध्या दास प्रथम वार्ड में सड़क किनारे कचरे का ढेर लगा है, जिससे आसपास के लोग परेशान हैं। शिवपुरी कॉलोनी में भी खुले में कचरे के कारण स्थानीय निवासियों को निकलना भी मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, डालीगंज और अन्य घनी आबादी वाले इलाकों में कचरे के ढेर से दुर्गंध उठ रही है, जिससे लोगों की दैनिक दिनचर्या प्रभावित हो रही है। इस तरह की स्थिति उत्पन्न होने से न केवल स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है, बल्कि निवासियों में आक्रोश भी व्याप्त हो रहा है।
सफाई कर्मचारियों का प्रदर्शन भी इस समस्या को और जटिल बना रहा है। नगर निगम मुख्यालय पर कर्मचारियों ने अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और अपने कामकाज में सुधार की मांग की है। सफाई कार्य में अनुबंधित एलएसए कंपनी की नाकामी के कारण पार्षदों ने सख्त नाराजगी व्यक्त की है। पार्षदों का आरोप है कि कंपनी डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन का कार्य ठीक से नहीं कर रही है, लेकिन फिर भी इसी कंपनी को ठेका दे दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप शहर में सफाई की व्यवस्था और बिगड़ गई है।
स्वच्छता रैंकिंग की बात करें, तो लखनऊ 2023 की रैंकिंग में 44वें स्थान पर जा पहुंचा है, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 27 अंकों की गिरावट दर्शाता है। हालांकि नगर निगम के अधिकारी कामकाज के दावे करते हैं, लेकिन लंबित सफाई कार्य और नागरिकों की शिकायतों के चलते उन पर विश्वास नहीं किया जा रहा है। नागरिकों का कहना है कि उनके द्वारा किए गए प्रयासों का कोई प्रभाव महसूस नहीं होता, जिसके चलते शहर की सफाई व्यवस्था के प्रति लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।
वास्तव में, यह पूरा मामला केवल सफाई के ठेकों से बढ़कर नागरिकों की स्वास्थ्य और जीवनशैली तक पहुंच गया है। यदि जल्दी ही इसे नहीं सुलझाया गया, तो यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है। नगर निगम को जल्द ही इस दिशा में ठोस कार्रवाई करनी होगी, ताकि लखनऊ अब तक की सबसे खराब स्वच्छता रैंकिंग से उबर सके।









