अधीनस्थ कर्मचारी के कर्तव्य पालन में विफल रहने के आधार पर जिम्मेदारी मुक्त नहीं हो सकता प्रभारी
जयपुर, 12 सितंबर । राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी डिस्पेंसरी में तैनात चिकित्सक को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने से जुडे मामले में कहा है कि अधीनस्थ कर्मचारी के कर्तव्य पालन में विफल रहने के आधार पर प्रभारी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता है। इसके साथ ही अदालत ने 19 साल पहले दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश माखनलाल मिश्रा की ओर से साल 2002 में दायर याचिका को खारिज करते हुए दिए।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह दलील नहीं दे सकता कि उसके अधीनस्थ कर्मचारी ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया, इसलिए उसने अपनी समस्त जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाए। इसके अलावा यह भी सामने नहीं आया की याचिकाकर्ता ने अपने अधीनस्थ कर्मचारी को काम नहीं करने को लेकर कोई नोटिस दिया हो।
याचिका में कहा गया कि वह बैराठ के किशनपुर की आयुर्वेद डिस्पेंसरी में आयुर्वेद चिकित्सक ग्रेड-2 के तौर पर कार्यरत था। उसे साल 1994 में आरोप पत्र दिया कि उसने एक सरकारी कर्मचारी द्वारका दास को बचाने के लिए अक्टूबर 1989 से सितंबर 1991 तक 24 स्वास्थ्य प्रमाण पत्र जारी किए। वहीं बाद में जांच के बाद उसे फरवरी, 1997 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी। इसे चुनौती देते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप उसकी चिकित्सा प्रमाण पत्र जारी करने की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह् लगाने वाले नहीं थे, बल्कि इस तथ्य से संबंधित थे कि ऐसे जारी किए गए मेडिकल प्रमाण पत्र रजिस्टर में दर्ज नहीं किए गए थे। याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता डिस्पेंसरी का प्रभारी था और उसका काम प्रमाण पत्रों को रजिस्टर में दर्ज करने का नहीं था। इस कार्य की जिम्मेदारी वहां पदस्थापित एक कंपाउंडर के पास थी। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया है।









