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सामाजिक संतुलन बिगाड़ने वाली धार्मिक प्रथाओं की शुरुआत या विस्तार अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित नहीं : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 04 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि किसी ऐसी धार्मिक प्रथा या उपयोग की शुरुआत या विस्तार, जो पहले से प्रचलित नहीं थी, विशेष रूप से यदि वह मौजूदा सामाजिक संतुलन को बिगाड़ती है तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है। खंडपीठ ने आगे कहा कि राज्य के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह किसी वास्तविक व्यवधान का इंतज़ार करे, बल्कि, जहां ऐसी गतिविधि से सार्वजनिक जीवन प्रभावित होने की आशंका हो, वहां राज्य उचित निवारक उपाय कर सकता है।

इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने ‘असीन’ नामक व्यक्ति द्वारा दायर रिट याचिका खारिज की। याचिका में याचिकाकर्ता ने अधिकारियों से संभल ज़िले के गांव में स्थित ज़मीन के एक टुकड़े पर नमाज़ अदा करने के लिए सुरक्षा और अनुमति प्रदान करने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने जून 2023 की एक ‘दान-विलेख’ के आधार पर उस निजी सम्पत्ति पर अपना स्वामित्व होने का दावा किया था। उसने यह तर्क दिया कि सम्बंधित अधिकारी ऐसी प्रार्थनाओं को रोक रहे हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने यह दावा किया कि विवादित ज़मीन ‘आबादी भूमि’ के रूप में दर्ज है-अर्थात् ऐसी भूमि जो सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित है और उस पर याचिकाकर्ता का कोई स्वामित्व अधिकार नहीं है।

उल्लेखनीय है कि, खंडपीठ को यह जानकारी दी गई कि उक्त स्थान पर पारंपरिक रूप से केवल ईद के अवसर पर ही नमाज़ अदा की जाती रही है। इस स्थापित प्रथा पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया। यह भी प्रस्तुत किया गया कि याचिकाकर्ता गांव के भीतर और बाहर से लोगों को आमंत्रित करके नियमित रूप से बड़े पैमाने पर सामूहिक नमाज़ अदा करने की एक नई प्रथा शुरू करने का प्रयास कर रहा है।

अपने आदेश में खंडपीठ ने यह उल्लेख किया कि यद्यपि संविधान धर्म का पालन करने के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है, तथापि वह यह भी स्पष्ट करता है कि यह अधिकार ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ के अधीन है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि धर्म का पालन करने का अधिकार कोई असीमित अधिकार नहीं है, बल्कि इसका प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे न तो अन्य लोगों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े और न ही सार्वजनिक जीवन के सामान्य कामकाज में कोई व्यवधान उत्पन्न हो।

खास बात यह है कि बेंच ने राय दी कि मौजूदा कानूनी धार्मिक प्रथाएं और लंबे समय से चले आ रहे नियम या सीमित या खास मकसद के लिए दी गई इजाजतें अपने आप में सही हो सकती हैं, लेकिन सिर्फ़ धर्म या निजी पसंद के आधार पर कोई नया या एकतरफ़ा दावा नहीं किया जा सकता। बेंच ने साफ़ किया कि राज्य को संवैधानिक तौर पर यह अधिकार है। सही मामलों में यह उसकी ज़िम्मेदारी भी है कि वह बिना कानूनी अधिकार के सार्वजनिक ज़मीन के इस्तेमाल को रोके।

निजी ज़मीन पर होने वाली निजी धार्मिक गतिविधियों के बारे में कोर्ट ने कहा कि निजी प्रार्थनाएं, पारिवारिक पूजा और दूसरी सीमित धार्मिक गतिविधियां आम तौर पर संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक आज़ादी के दायरे में आती हैं। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि यह सुरक्षा सिर्फ़ उन गतिविधियों तक सीमित है, जो सचमुच निजी, कभी-कभार होने वाली और शांति भंग न करने वाली हों। बेंच ने ज़ोर देकर कहा कि जहां कोई धार्मिक गतिविधि निजी दायरे से बाहर निकलकर सार्वजनिक दायरे को प्रभावित करने लगती है, वहां कानूनी नियम लागू होंगे। इसके अलावा, कोर्ट ने साफ़ किया कि कानून के मुताबिक अधिकारियों को असल में कोई गड़बड़ी होने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है, जहां किसी गतिविधि से सार्वजनिक व्यवस्था पर असर पड़ने की सम्भावना हो, वहां राज्य को पहले से ही कार्रवाई करने का अधिकार है।

मामले के गुण-दोषों पर विचार करते हुए पीठ ने पाया कि विचाराधीन भूमि सरकारी (सार्वजनिक) भूमि के रूप में दर्ज है और इस पर स्वामित्व का दावा केवल अस्पष्ट सीमा-विवरणों पर आधारित है। इसके अलावा भी न्यायालय ने कहा कि यदि इस भूमि को निजी भूमि मान भी लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता किसी प्रकार की राहत पाने का हकदार नहीं है, क्योंकि वह यहां एक नई धार्मिक प्रथा की शुरुआत कर रहा है। कोर्ट ने यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता का कोई ऐसा कानूनी अधिकार सिद्ध नहीं होता, जिसे लागू करवाया जा सके, पीठ ने रिट याचिका खारिज कर दी।