यूपी सरकार का 9 हजार नई अदालतों का बड़ा प्लान, 1.31 करोड़ केस बने चुनौती!

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार से नई अदालतों की स्थापना को लेकर सवाल उठाया है। कोर्ट ने यह माना है कि संविधान के अनुसार न्यायपालिका राज्य का तीसरा स्तंभ है और इस स्तंभ के समक्ष सिविल तथा आपराधिक मुकदमों की भारी संख्या मौजूद है। न्याय व्यवस्था के इस संकट के समाधान हेतु उचित आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है। इसके लिए बजट में आवश्यक फंड का प्रावधान करना भी अनिवार्य है। कोर्ट ने प्रदेश में दीवानी और आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए 9,149 नई अदालतों की स्थापना की आवश्यकता की ओर इशारा किया है।

अदालत ने प्रमुख सचिव न्याय तथा अपर मुख्य सचिव वित्त को दो हफ्ते के भीतर इस संदर्भ में अपना समर्पित जवाब प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। जस्टिस एआर मसूदी और जस्टिस राजीव सिंह की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सवाल पूछा कि पूर्व में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 24 अप्रैल 2024 को हुए निर्णय के आधार पर पहली चरण में 2,693 अदालतों की स्थापना के लिए क्या प्रयास किए गए हैं। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में न्यायपालिका के समक्ष लंबित मामलों की संख्या अत्यधिक है, विशेषकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में।

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार, 1 जनवरी 2025 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में 11 लाख से अधिक मामले लंबित थे, जिनमें से 71 प्रतिशत मामले तीन साल से अधिक समय से निपटाए नहीं जा सके हैं। इसके साथ ही जिला अदालतों में 1.2 करोड़ मामले लंबित हैं, जिसमें से 53 प्रतिशत मामले तीन साल से अधिक समय से पेंडिंग हैं। अदालती मामलों की इस स्थिति का मुद्दा इससे भी गंभीर हो जाता है, जब यह देखी जाती है कि उत्तरोत्तर जजों की उपलब्धता भी कम हो रही है।

साक्ष्य बताते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों के आधे से अधिक पद खाली हैं, जिसमें कुल 160 जजों की स्वीकृति है और वर्तमान में केवल 79 जज काम कर रहे हैं। इसी प्रकार, राज्य की निचली अदालतों में भी लगभग 5,000 जजों के पद वर्तमान में रिक्त हैं। ऐसी स्थिति में न्याय व्यवस्था के सुधार के लिए प्रदेश सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में नई अदालतों की स्थापना का ऐलान किया था। इस हेतु 800 करोड़ रुपए का बजट भी प्रस्तावित किया गया था। हालाँकि, इन प्रस्तावित योजनाओं का क्रियान्वयन उम्मीद के मुताबिक नहीं हो सका।

उत्तर प्रदेश में न्यायिक और कानून व्यवस्था की स्थिति पर गौर करते हुए, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि राज्य की जेलों में कैदियों की संख्या अपनी क्षमता से 80 प्रतिशत अधिक है। यह मुख्य रूप से अदालतों में मामलों की सुनवाई में हुई देरी के कारण है, जिससे विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेल में रहते हैं। इसके अलावा, पुलिस विभाग में भी रिक्तियों की समस्या बनी हुई है। जनवरी 2023 तक पुलिस के विभिन्न पदों पर रिक्तियों के चलते राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में न्यायपालिका, पुलिस और जेल प्रणाली को सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।

अंत में, यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है, ताकि नागरिकों को त्वरित और सटीक न्याय मिल सके। न्याय के अभाव में समाज की समग्रता प्रभावित होती है, और इसे समय पर सुधारना अत्यंत आवश्यक है।