हरिंदर सिंह बरनाला से AAP उम्मीदवार: सांसद मीत हेयर के बचपन के साथी!
पंजाब की चार विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के तहत आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपने कार्यकर्ता हरिंदर सिंह धालीवाल को उम्मीदवार के रूप में नामित किया है। हरिंदर सिंह संगरूर के सांसद और बरनाला के पूर्व विधायक गुरमीत सिंह मीत हेयर के करीबी मित्र माने जाते हैं। धालीवाल का संबंध बरनाला जिले के गांव छीनीवाल से है, जहां उनका परिवार एक मेहनती किसान परिवार के रूप में जाना जाता है। उनके पिता पशु पालन विभाग से रिटायर हैं।
हरिंदर और मीत हेयर की मित्रता स्कूल के दिनों से शुरू हुई, जब दोनों ने बरनाला के बाबा गांधा सिंह स्कूल से बारहवीं कक्षा पास की। इसके बाद, दोनों ने बनूड़ कॉलेज से बीटेक की पढ़ाई की और एक साथ आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। इस प्रकार की निकटता के कारण हरिंदर सिंह को मीत हेयर का दाहिना हाथ माना जाता है, और वे हमेशा एक साथ ही देखे जाते हैं। मीत हेयर ने अपने मित्र को उम्मीदवार बनाने की सिफारिश की है, जिसका मुख्य उद्देश्य बरनाला विधानसभा सीट पर अपने प्रभाव को बनाए रखना है।
हालांकि, हरिंदर सिंह को टिकट देने के निर्णय से आम आदमी पार्टी में संभावित गुटबाजी को लेकर चिंताएं भी बढ़ने लगी हैं। पार्टी के जिला अध्यक्ष गुरदीप सिंह बाठ उप चुनाव का टिकट हासिल करने के लिए प्रमुख दावेदारों में से एक थे। हरिंदर का टिकट मिलना, गुरदीप सिंह बाठ और अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच तकरार की स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसे में पार्टी में आंतरिक मतभेदों का बढ़ना बहुत संभव है।
हरिंदर सिंह धालीवाल 35 वर्ष के विवाहित युवक हैं, जो इस उपचुनाव में पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं। यदि इस स्थिति में कोई भी आंतरिक टकराव उत्पन्न होता है, तो वह आम आदमी पार्टी के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर सकता है। इसके अलावा, पार्टी की चुनावी रणनीतियों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे चुनावी अभियान की दिशा में परेशानी आ सकती है।
इस प्रकार, हरिंदर सिंह के टिकट को लेकर जो स्थिति निर्मित हो रही है, उससे यह स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी को अपनी आंतरिक गुटबाजी को संभालने में सक्षम होना आवश्यक है। आगामी उपचुनाव में धालीवाल की भूमिका और उनकी नीतियों के साथ-साथ पार्टी के भीतर की सूरत बहुत बदल सकती है। आगामी दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पार्टी इस चुनौती को सुलझा पाती है या नहीं, क्योंकि इससे आगामी चुनावी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।









