फिरोजपुर: सांसद के भाई की हार, विधायक समर्थक सरपंच 301 वोट से विजयी!
फाजिल्का में हाल में सम्पन्न पंचायत चुनावों में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना घटी है। फिरोजपुर से लोकसभा सांसद शेर सिंह घुबाया के भाई मूंछा सिंह चुनाव हार गए हैं। यह हार उस समय हुई जब गांव घुबाया के विधायक समर्थक राजकुमार राजू ने चुनाव में जीत प्राप्त की। जैसे ही जलालाबाद से विधायक को इस परिणाम का पता चला, उन्होंने तत्काल मौके पर पहुंचकर ट्रैक्टर पर सवार होकर गांव में रात का रोड शो किया। विधायक ने इस चुनाव को शांतिपूर्वक तरीके से कराने का श्रेय देते हुए यह भी बताया कि सांसद के भाई मूंछा सिंह को करीब 301 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
विधायक गोल्डी कंबोज ने मीडिया से बात करते हुए इस परिणाम पर तंज करते हुए कहा कि यह एक संकेत है कि राजनीतिक ताकतें हार गईं हैं और आम आदमी की जीत हुई है। उन्होंने घुबाया परिवार पर आरोप लगाया कि उन्होंने मूंछा सिंह को जिताने के लिए पूरी कोशिश की थी, लेकिन फिर भी अपने ही गांव के लोगों से उन्होंने जीत हासिल नहीं की। गोल्डी कंबोज ने कहा कि सांसद शेर सिंह घुबाया और उनके बेटे दविंदर सिंह घुबाया जैसे नेता ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकी, फिर भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इस चुनाव में घुबाया परिवार के खिलाफ धक्केशाही के आरोप भी लगाए गए थे। लेकिन विधायक ने इसे खारिज करते हुए गांव में हुए शांतिपूर्ण चुनाव को सबूत के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि अगर चुनाव धक्केशाही से किए गए होते, तो परिणाम निश्चित ही अलग होते। विधायक ने यह भी कहा कि गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया है कि वे घुबाया परिवार के खिलाफ हैं और अब उन्हें अपने ही गांव में पराजय का सामना करना पड़ा है।
गोल्डी कंबोज ने चुनाव परिणाम के संदर्भ में यह बात भी कही कि जो लोग लोगों का हक छीनने की कोशिश करते हैं, उनके लिए आखिरकार वही स्थिति आ जाती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह चुनाव केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव का भी प्रतीक है। गांव के लोगों ने एक स्वर में निर्णय लिया है कि वे अपनी पसंद के उम्मीदवार का चुनाव करेंगे और इसके लिए किसी भी दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।
इन परिणामों ने न केवल फाजिल्का में राजनीतिक समीकरण को प्रभावित किया है, बल्कि यह दिखाता है कि ग्रामीण जनता अब अधिक जागरूक हो रही है और अपने अधिकारों के प्रति सजग है। यह परिवर्तन राजनीति के क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगाता है कि अब गांवों में भी लोगों की आवाज को महत्व दिया जाएगा। ऐसे माहौल में यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में चुनावी राजनीति में क्या बदलाव आएंगे।









