निगम के 272 प्लॉट घोटाले में तीन की जमानत खारिज, 3551 फाइलों के बदले 6959 एंट्री मिलीं
उदयपुर, 11 अगस्त । उदयपुर के बहुचर्चित नगर निगम 272 प्लॉट घोटाले में उदयपुर न्यायालय ने पूर्व जिला अल्पसंख्यक महिला अधिकारी हेमलता कांकरिया, उनके पति निरंजन मोगरा सहित तीन आरोपिताें की जमानत याचिका खारिज कर दी। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन अधिकारी ने जमानत का विरोध करते हुए जांच में सामने आए गंभीर तथ्यों को कोर्ट के समक्ष रखा।
अभियोजन के अनुसार, यूआईटी से नगर निगम को केवल 3551 भूखंडों की फाइलें ट्रांसफर की गई थीं, जबकि निगम के प्रॉपर्टी रजिस्टर की जांच में 6959 एंट्रियां दर्ज मिलीं। जांच में भूखंड संख्या 115 के संबंध में गलत दस्तावेज तैयार कर उसे बेचने और राशि के लेन-देन के तथ्य भी सामने आए हैं।
कोर्ट ने केस डायरी का अध्ययन करने के बाद आरोपिताें की आपराधिक हिस्ट्री, अपराध की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत का लाभ देना उचित नहीं माना। कोर्ट के समक्ष यह भी बताया गया कि आरोपित हेमलता कांकरिया के खिलाफ पहले से अन्य आपराधिक मामले दर्ज हैं।
उदयपुर एसओजी ने करीब एक सप्ताह पहले हेमलता कांकरिया और उनके पति निरंजन मोगरा को जोधपुर से गिरफ्तार किया था। वहीं आरोपित दिनेश मेहता को गुजरात से पकड़ा गया था।
जांच में सामने आया कि यूआईटी से प्राप्त मूल कागजों में कुछ गलत आवंटन पत्र भी मिले थे। इन आवंटन पत्रों में मूल राशि जमा नहीं होने के बावजूद मुहर लगाई गई थी। इसके बाद नगर निगम ने इन फर्जी दस्तावेजों को प्रमाणित और सही मानते हुए संबंधित व्यक्तियों के नाम लीज डीड जारी कर दी।
मामले में वर्ष 2022 में रिपोर्ट दर्ज हुई थी। आरोप है कि नगर निगम के अधिकारी-कर्मचारियों की मिलीभगत से हिरण मगरी सेक्टर-11 स्थित निगम के 546 नंबर प्लॉट के फर्जी दस्तावेज तैयार करवाए गए। फर्जी व्यक्ति किशन पटेल के नाम से निगम में लीज डीड और नामांतरण पत्र जारी करवाकर इस प्लॉट को सलूंबर निवासी अनिल कचौरिया को 50.01 लाख रुपये में बेच दिया गया।
एसओजी जांच में आरोपित राजेंद्र धाकड़ को गिरफ्तार किया गया था। पूछताछ में सामने आया कि उसने एकलव्य बस्ती, मल्लातलाई निवासी किशनलाल गमेती के बैंक खाते में 7 लाख रुपये जमा कराए थे। किशनलाल ने यह राशि निकालकर किशन मारवाड़ी और राकेश सोलंकी को दी। दोनों ने रुपये विक्रम ताकड़िया तक पहुंचाए थे।
बताया गया कि यूडीए ने वर्ष 2012 में कुछ कॉलोनियां नगर निगम को ट्रांसफर की थीं। इनमें कई भूखंड खाली और अधिकांश कॉर्नर प्लॉट थे। सार-संभाल के अभाव में कई भूखंडों पर लोगों ने कब्जा कर लिया। बाद में कई भूखंडों के फर्जी दस्तावेज तैयार कर नामांतरण खुलवाए गए और कुछ भूखंड दलालों के माध्यम से बेच दिए गए।








