हरियाणा बॉर्डर पर किसान ने आत्महत्या की, गीजर फटने से आंदोलनकारी झुलसा!
हरियाणा-पंजाब के शंभू बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में एक और दुखद घटना घटित हुई है। गुरुवार को तरनतारन जिले के पहूविंड गांव के निवासी रेशम सिंह (55) ने सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली। यह घटना लंगर स्थल के पास हुई। रेशम को तुरंत पटियाला के राजिंदरा अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उसके जीवन की रक्षा नहीं हो सकी। किसान नेता तेजबीर सिंह ने इस बात का उल्लेख किया कि रेशम सरकार द्वारा किसान आंदोलन को लेकर उठाए गए कदमों के प्रति नाखुश थे। यह पहली बार नहीं है कि किसी किसान ने आत्महत्या की हो; 14 दिसंबर को भी रणजोध सिंह ने सल्फास खा लिया था, जिसका अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। इन घटनाओं ने किसान समुदाय के भीतर गहरी चिंता और असंतोष पैदा किया है।
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने इस आंदोलन का समर्थन किया है और गुरुवार को मोगा में आयोजित महापंचायत के दौरान किसान नेता राकेश टिकैत और जोगिंदर उगराहां ने ऐलान किया है कि उनकी 6 सदस्यीय कमेटी 101 किसानों के जत्थे के साथ खनौरी बॉर्डर की ओर जाएगी। यहाँ पर वे सरवण पंधेर और जगजीत डल्लेवाल के बीच सहमति स्थापित करने का प्रयास करेंगे। इसी बीच, खनौरी बॉर्डर पर 45 दिनों से आमरण अनशन कर रहे जगजीत सिंह डल्लेवाल की स्थिति गंभीर बनी हुई है। हाल ही में एक किसान गीजर फटने से झुलस गया, जिसको पटियाला के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया, उसकी पहचान गुरदयाल के रूप में हुई है।
पंजाब में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है। डल्लेवाल की बिगड़ती तबीयत को देखते हुए पटियाला के SSP नानक सिंह और सरकारी डॉक्टरों की टीम अस्पताल में उनका हालचाल जानने पहुंची। डॉक्टरों के अनुसार, डल्लेवाल का रक्तचाप बहुत कम हो गया है और उन्हें बोलने में भी कठिनाई हो रही है। यह स्थिति किसानों की तालाबंदी के चलते उत्पन्न हुई है और उनके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रही है। समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक ने भी डल्लेवाल से मुलाकात की और उन्होंने पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव से किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए बातचीत करने का आश्वासन दिया है।
किसान नेताओं ने आगामी दिनों के लिए अपनी रणनीतियाँ तैयार की हैं। 10 जनवरी को पूरे देश में विरोध प्रदर्शन होगा, जिसमें किसानों द्वारा प्रधानमंत्री के पुतले जलाए जाएंगे। इसके बाद, 13 जनवरी को लोहड़ी के अवसर पर केंद्र सरकार की कृषि विपणन नीति का विरोध करने के लिए ड्राफ्ट की कॉपियाँ जलाई जाएंगी। इसके अलावा, 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च आयोजित करने की योजना में अधिक लोगों को शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने डल्लेवाल मामले में सरकार के रवैये पर सवाल उठाया है और अगले सुनवाई की तारीख 10 जनवरी निर्धारित की गई है।
इन घटनाओं ने स्पष्ट किया है कि किसान आंदोलन केवल नीतिगत मुद्दों का नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन चुका है। राजा-महाराजा की तरह शासन चलाने वाले नीति निर्धारकों को अब किसानों की आवाज सुननी होगी। अन्यथा, आंदोलन में बढ़ती आत्महत्याओं और असंतोष के बीच, स्थिति और अधिक विकट हो सकती है।









