24 साल बाद फिर बैलेट पेपर से अमृतसर मेयर चुने जाएंगे, निर्दलीयों पर नजरें!
पंजाब के अमृतसर में मेयर पद के लिए चुनावी मुकाबला अब बेहद कड़ा हो गया है, क्योंकि किसी भी राजनीतिक पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ है। कांग्रेस पार्टी इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों को अपनी ओर खींचने के लिए प्रयासरत है, वहीं सत्ताधारी पार्टी भी अपना त्रिकोण बनाने में लगी हुई है। इस चुनावी उठापटक में यह देखा जा रहा है कि एक ओर जहाँ पार्टियाँ अपने पार्षदों को एकत्रित कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवारों की मांग और कीमत भी बढ़ गई है।
अमृतसर नगर निगम में कुल 85 पार्षद हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने केवल 40 पार्षदों के साथ बहुमत के लिए आवश्यक 47 के आंकड़े से पीछे रह गई है। यदि निगम क्षेत्र में आने वाले 7 विधायकों के वोट मिल जाते हैं, तो बहुमत प्राप्त करना संभव हो सकता है। वहीं, इस समय अमृतसर में 8 निर्दलीय पार्षद भी हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश कांग्रेस के समर्थन में आने को राजी नहीं हैं। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी (AAP) अपने 24 पार्षदों के साथ, अकाली दल और निर्दलीय उम्मीदवारों को अपने खेमे में लाने की कोशिश में है। अगर AAP इस प्रयास में सफल होती है, तो उनके पास 43 वोट हो सकते हैं, जो कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकता है।
यदि किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, तो चुनाव बैलेट पेपर के माध्यम से होंगे, और जिसके पास अधिक वोट होंगे, वही मेयर बनेगा। 2000 में भी ऐसी स्थिति में बीजेपी के सुभाष शर्मा को इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद कांग्रेस और बीजेपी ने अपने-अपने मेयर को चुनने की कोशिश की थी। उस समय भी पार्षदों को अपने पक्ष में लाने के लिए भरपूर प्रयास किए गए थे। इस बार भी स्थिति कुछ वैसी ही दिखाई दे रही है, क्योंकि न तो कांग्रेस और न ही आम आदमी पार्टी के पास पर्याप्त संख्या में पार्षद हैं।
इस माहौल में निर्दलीय पार्षदों की कीमत बढ़ती जा रही है। राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि कई निर्दलीय पार्षदों को मोटी रकम की पेशकश की जा रही है, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस विषय पर चर्चा जोरों पर है। सभी पार्टियाँ अपने-अपने पार्षदों को सुरक्षित रखने के लिए चिंतित हैं, जिसके लिए शपथ दिलाने का काम भी किया जा रहा है, ताकि कोई अन्य दल में न जा सके। कई राजनीतिक दल इस मामले में बैठकें भी आयोजित कर रहे हैं, ताकि सभी स्थिति को अपने अनुकूल कर सकें।
इस चुनावी प्रक्रिया में पार्षदों का जीना मुश्किल हो गया है, और सभी पार्टियाँ अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के तहत काम शुरू करने के लिए प्रतीक्षारत हैं। सभी का ध्यान इस बात पर है कि चुनाव की घंटी बजने से पहले वे अपने पक्ष में मतदान कर सकें और मेयर पद पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को मात दे सकें। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अगला मेयर कौन बनता है और यह राजनीतिक संघर्ष किस दिशा में जाता है।









