सुंदरकांड का सार मैत्री, ज्ञान और स्वयंप्रभा है: बापू
हरिद्वार, 07 जुलाई । श्री रामकथा के आठवें दिन प्रसिद्ध रामकथावाचक मोरारी बापू ने कहा कि सुंदरकांड का मूल संदेश मैत्री, ज्ञान और स्वयंप्रभा है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद विकार हैं। संतोष, दया, क्षमा, विनम्रता, संयम और शांति जैसे गुण ही जीवन को अमृतमय बनाते हैं, जबकि निंदा, क्रोध, झूठ, ईर्ष्या और लोभ व्यक्ति को भीतर से कमजोर करते हैं।
कथा के दौरान उन्होंने रावण के चार प्रतीकात्मक सहयोगियों, दुर्मुख, सूररिपु, अतिकाय और महोदर का उल्लेख करते हुए उन्हें मनुष्य के भीतर मौजूद दोषों का प्रतीक बताया। उनके अनुसार दुर्मुख निंदा, शिकायत, क्रोध और ईर्ष्या का, सूररिपु दैवी गुणों के विरोध का, अतिकाय चंचल मन का तथा महोदर अतृप्त लोभ का प्रतीक है। इन पर विजय केवल स्वाध्याय, संयम, यज्ञ और संतोष के माध्यम से ही संभव है।
आदि शंकराचार्य की विवेकचूड़ामणि का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को विषय-वासनाओं का त्याग कर संतोष, दया, क्षमा, आर्जव (विनम्रता), प्रशांति और संयम को अमृत की तरह अपनाना चाहिए।
रामकथा के आठवें दिन व्यासपीठ पर तीन विशेष आयोजन भी हुए। व्यासपीठ एक वैदिक विवाह की साक्षी बनी, जहां समीरभाई-वीनाबहन की पुत्री वृक्षा और जगदीशभाई-गीताबहन के पुत्र प्रेम का वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न हुआ।
इसी अवसर पर नेपाल के काठमांडू स्थित तपोवन आश्रम से आए ओशो संन्यासी स्वामी आनंद अरुण ने अपनी पुस्तक का व्यासपीठ पर लोकार्पण कराया। साथ ही भद्रायुभाई द्वारा तैयार एक विशेष पुस्तिका भी व्यासपीठ को समर्पित की गई।
मोरारी बापू ने बताया कि राम मंदिर निर्माण के लिए आयोजित पिठोरिया हनुमान कथा के दौरान व्यासपीठ की ओर से 19 करोड़ रुपये का योगदान दिया गया था। कथा के अंत में उन्होंने लंकाकांड के सेतुबंध और रामेश्वर स्थापना के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि अगले दिन रामकथा का समापन होगा।









