आरोप में बदलाव का अधिकार केवल अदालत को, पीड़ित या अभियोजन को नहीं : हाईकोर्ट
प्रयागराज, 07 फरवरी । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि आपराधिक मामलों में आरोप को बदलने, जोड़ने या संशोधित करने का विशेष अधिकार केवल अदालत के पास होता है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 के तहत किसी भी पक्ष-चाहे वह पीड़ित हो, अभियोजन हो या आरोपों-को आरोप बदलने की मांग करने का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम की एकलपीठ ने ‘सिराज अली उर्फ बाबू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में दिया।
मामले के अनुसार, वर्ष 2013 में दर्ज एफआईआर में आरोप था कि सिराज ने पीड़ित को पकड़ा और सह-आरोपी ने गोली चलाई, जिससे उसकी कोहनी में चोट लगी। प्रारंभ में ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 324 (खतरनाक हथियार से चोट) के तहत आरोप तय किए थे। बाद में अभियोजन पक्ष ने धारा 216 के तहत आवेदन देकर आरोपों को धारा 307 (हत्या का प्रयास) में बदलने की मांग की, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इस आदेश को आरोपित ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अपीलकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ‘पी. कार्तिकलक्ष्मी बनाम गणेश’ फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अभियोजन को आरोप बदलने के लिए आवेदन करने का अधिकार नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 216 एक सक्षम प्रावधान है, जो अदालत को न्यायहित में किसी भी समय आरोप संशोधित करने की शक्ति देता है। पक्षकार केवल तथ्यों को अदालत के समक्ष रखने के लिए आवेदन कर सकते हैं, लेकिन निर्णय अदालत के स्वतंत्र विवेक पर निर्भर करता है।
कोर्ट ने एक्स-रे रिपोर्ट में पीड़ित की कोहनी के पास दो छर्रे मिलने और घायल गवाह के बयान को महत्वपूर्ण मानते हुए कड़े आरोप तय करने को उचित ठहराया। अंततः हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही मानते हुए अपील खारिज कर दी।









