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मंडी के वैज्ञानिक ने इज़ाद की बंदरों व जंगली जानवरों से फसलों को बचाने की सस्ती एवं पर्यावरण मित्र तकनीक

मंडी, 25 जनवरी । मंडी जिले की बल्ह घाटी के गांव राजगढ़ के कृषि वैज्ञानी नरेंद्र पाल ठाकुर ने फसलों को बंदरों व जंगली जानवरों से बचाने के लिए एक पर्यावरण मित्र तकनीक खोजी है। यह खोज उन्होंने जम्मू के स्कौस्ट विश्वविद्यालय में तैनाती के दौरान की, जिसका अब उस राज्य के सैंकड़ों किसान बागवान लाभ उठा रहे हैं। बीते अगस्त महीने में सेवानिवृत होकर अपने घर राजगढ़ आए नरेंद्र पाल ठाकुर अब इस तकनीक को मंडी जिले व हिमाचल प्रदेश के किसान बागवानों तक पहुंचाना चाहते हैं जो अपनी फसलों को बंदरों व जंगली जानवरों से बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

एक भेंट में उन्होंने बताया कि चूंकि अब तक जितनी भी तकनीक विकसित हुई हैं वह महंगी हैं व पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा सही नहीं है मगर यह तकनीक न तो महंगी है बल्कि पर्यावरण मित्र भी है और इससे किसान बागवान दोहरा लाभ भी ले सकते हैं। करौंदा नाम का पौधा तैयार किया गया। यह ज्यादा महंगा नहीं है। किसान व बागवान को इसकी बाड़ अपने खेतों या बागीचे के चारों ओर लगानी है। एक साल में यह पौधा तैयार हो जाता है और दूसरे साल में यह फल भी देने लग जाता है। करौंदा पौधा एक तरह से हिमाचल में भी पाए जाने वाले खरनू जिसे कहीं कहीं खर्रणू व गरनू भी कहा जाता है की तरह है। यह पौधा कांटेदार होने के कारण बंदरों व दूसरे जानवरों को खेत व बगीचे में जाने से रोकता है और फसलों की प्राकृतिक तौर पर सुरक्षा करता है। इसके फल औषधीय गुणों की खान हैं जो विटामिन सी भी प्रचुर मात्रा में होता है तथा यह खाने में भी बेहद स्वादिष्ट खट्टा मिट्ठा होता हैं। इसका अचार, जैम व जैली आदि तैयार किए जा सकते हैं जिससे किसान बागवानों को अतिरिक्त आय हो सकती है।

नरेंद्र पाल ठाकुर का कहना है कि चूंकि जम्मू व हिमाचल प्रदेश एक जैसे राज्य हैं ऐसे में इसे यहां पर आसानी से उगाया जा सकता है। वह अब अपने क्षेत्र में इसे प्रयोग के तौर किसानों को बताएंगे व बाड़ तैयार करेंगे। प्रयास करेंगे कि इसके पौधे आसानी से किसान बागवानों को मिल सकें।