मदरसों की शिक्षा में बदलाव की सख्त जरूरत

भारत एक सभ्य, सहिष्णु और विविधताओं से भरा देश है, जहाँ सैकड़ों भाषाएँ, दर्जनों धर्म और असंख्य परंपराएँ एक ही भूमि पर सांस लेती हैं। यही इसकी पहचान भी है और यही इसकी ताकत भी। किंतु अफसोस, इसी सहिष्णुता को कुछ कट्टरपंथी ताकतें कमजोरी समझने लगी हैं। गुजरात एटीएस द्वारा हाल ही में अहमदाबाद से गिरफ्तार किए गए तीन आतंकियों डॉ. मोहिउद्दीन, सोहेल और आजाद सैफी के खुलासे ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है।

वस्‍तुत: इन तीनों ने देखा जाए तो सिर्फ देश के प्रमुख मंदिरों पर हमले की साजिश ही नहीं रची थी, ये “प्रसाद” में जहर मिलाकर हजारों निर्दोष श्रद्धालुओं की जान लेने की योजना बना रहे थे। एटीएस ने गिरफ्तार आतंकियों के पास से ‘रिसिन’ नामक बेहद खतरनाक जैविक जहर पाया है। यह अरंडी के बीजों से तैयार किया जाने वाला ऐसा रासायनिक पदार्थ है, जिसकी सिर्फ एक मिलीग्राम मात्रा किसी इंसान की जान लेने के लिए काफी होती है। आतंकियों की योजना थी कि दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद के बड़े-बड़े मंदिरों में यह जहर प्रसाद में मिलाकर भक्तों तक पहुँचाया जाए।

इसे आप आतंक की अमानवीयता के सबसे भयावह चेहरे के रूप में भी देख सकते हैं। किसी धर्मस्थल को निशाना बनाना और वहाँ आने वाले निर्दोष लोगों की हत्या की योजना बनाना, इस बात का प्रमाण है कि इस्लामिक आतंकवाद आज विचारधारात्‍मक जहर के रूप में सारी हदें पार चुका है और मौका पाते ही गैर मुसलमानों (हिन्‍दू, सिख, जैन एवं अन्‍य) को निगल रहा है।

गुजरात एटीएस की जाँच से यह भी सामने आया है कि ये तीनों आरोपी सीधे अफगानिस्तान में बैठे अपने हैंडलर “अबू खदीजा” से जुड़े थे। यानी, ये अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क का हिस्सा हैं। अबू खदीजा ने इन्हें ऑनलाइन ट्रेनिंग दी थी, किस तरह रिसिन तैयार किया जाए, किस तरह उसे प्रसाद में बिना शक पैदा किए मिलाया जाए और किस तरह मंदिरों में जाकर ‘रेकी’ (जासूसी) की जाए। कहना होगा कि आतंकवाद अब डिजिटल भी हो चुका है, ऑनलाइन क्लासेस, व्हाट्सएप चैनल्स और डार्क वेब के जरिए “जिहाद” की शिक्षा दी जा रही है और सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन युवाओं की जड़ें मदरसे की शिक्षा प्रणाली में ही दिखाई दे रही हैं।

आरोपियों में से सोहेल और आजाद का नाता मुजफ्फरनगर के एक मदरसे से बताया गया है। यही वह जगह है जहाँ बचपन से काफि‍रों (गैर मुसलमानों) से नफरत और जिहाद के नाम पर जन्‍नत (स्वर्ग) जैसी मानसिकता बोई जाती है। फरीदाबाद से गिरफ्तार एक अन्य मॉड्यूल के आतंकियों, डॉ. मुजम्मिल और डॉ. शाहीना शाहिद ने कबूल किया कि उनके निशाने पर अयोध्या का राममंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर थे। यह महज संयोग नहीं कि देश के वे ही स्थल निशाने पर हैं जो हिंदू अस्मिता के प्रतीक हैं। इन हमलों का मकसद सिर्फ मौतें नहीं बल्कि समाज में भय और विभाजन फैलाना है। यह “जिहाद” अब कोई संगठन नहीं, बल्कि एक मानसिक वायरस है जो धीरे-धीरे देश की एकता को खा रहा है।

सवाल यह है कि क्या स्‍वाधीनता के 78 साल बाद भी हम ऐसी संस्थाओं को खुली छूट देते रहेंगे जहाँ से नफरत और हिंसा की खेती हो रही है? मदरसों की शिक्षा में सुधार की बातें दशकों से हो रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव नगण्य हैं। वहीं, आतंकवाद की जड़ें अब सिर्फ सीमापार नहीं, बल्कि हमारे अपने मोहल्लों, अपने गाँवों, अपने शहरों तक पहुँच चुकी हैं। जब तक मदरसों की पाठ्यचर्या में राष्ट्रभक्ति, संविधान और आधुनिक शिक्षा को जगह नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे “डॉ. मोहिउद्दीन” और “सोहेल” पैदा होते रहेंगे।

एतिहासिक धरातल पर यदि विचार करें तो इस तरह की घटनाएँ कोई नई नहीं हैं। 2008 के अहमदाबाद बम धमाके हों या 2021 में घनी आबादी वाले इलाकों में पकड़े गए आईएसआईएस मॉड्यूल, लगभग हर केस में पाया गया है कि आतंकियों को मजहबी (धार्मिक) उन्माद ने ही प्रेरित किया। लेकिन दुखद यह है कि हर बार राजनीतिक वर्ग चुप रहता है। इसके इस्‍लामिक संगठन जो बड़ी- बड़ी बातें करते हैं, वे ऐसी घटनाओं पर चुप्‍पी साध लेते हैं। सभी धर्म समान हैं” कहने वाले नेता तब मौन हो जाते हैं जब कोई मंदिर निशाने पर आता है। क्यों? क्योंकि हिंदू समाज से वोट के नाम पर “धैर्य” की उम्मीद की जाती है। लेकिन कब तक? यदि कहीं क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आएगी तो फिर कहा जाएगा कि भारत में मुसलमानों पर अत्‍याचार और हिंसा हो रही है!

आज भारत की समस्या सिर्फ हथियारबंद आतंकियों की नहीं है, वस्‍तुत: उस सोच की है जो यह मानती है कि “काफि‍रों का खून (गैर मुसलमान हिन्‍दू एवं अन्‍य का) बहाना मजहब (धर्म) की सेवा है। इस सोच को सिर्फ पुलिस की गोलियों या जेलों से खत्म नहीं किया जा सकता; इसके लिए विचार और शिक्षा में शुद्धिकरण जरूरी है। अब कहना यही होगा कि भारत के मदरसों में जब तक बच्चों को कुरान के साथ संविधान, विज्ञान, इतिहास और मानवता की शिक्षा नहीं दी जाएगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

अब सरकार को चाहिए कि हर मदरसे का ऑडिट करवाए, देश में कोई भी अवैध मदरसा संचालित नहीं होना चाहिए, क्या पढ़ाया जा रहा है, किस फंडिंग से संचालित हैं और क्या उनके पास राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यक्रम है। यह देखना हर राज्‍य सरकार का कर्तव्‍य है। मदरसों को मजहबी संस्थान मानकर अनियंत्रित छोड़ देना, आने वाले वर्षों में यह मानकर चलिए कि भयंकर सामाजिक विस्फोट को जन्म देना है।

हर बार जब कोई आतंकी साजिश विफल होती है, हम राहत की साँस लेते हैं, चलो, इस बार बच गए लेकिन यह राहत कितनी देर की है? अगर शिक्षा, समाज और सरकार ने सामूहिक रूप से इस चुनौती का सामना नहीं किया, तो अगली बार बचने का मौका नहीं भी मिल सकता है। भारत को यह तय करना होगा कि सहिष्णुता और आत्मसमर्पण में फर्क क्या है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं कि देश के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को बार-बार कुचला जाए। अगर कोई विचारधारा यह सिखाती है कि गैर-मुस्लिम दुश्मन हैं, तो उसे “धार्मिक स्वतंत्रता” नहीं कहा जा सकता, वस्‍तुत: वह राष्ट्र-विरोधी अपराध है।

अब वक्त है कि भारत इस बीमारी का इलाज करे, दिल्‍ली कार ब्‍लास्‍ट सामने आया ही है, ऐसे में अब अति जरूरी हो गया है कि मदरसों में सुधार हो, इस्‍लामिक उपदेशों की निगरानी हो और सबसे जरूरी, इस्‍लामिक या अन्‍य किसी भी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ सामाजिक आंदोलन हो। जब तक भारत का युवा यह नहीं समझेगा कि धर्म, रिलीजन, मजहब, पंथ की रक्षा हत्या से नहीं, मानवता से होती है, तब तक ऐसी घटनाएँ दोहराई जाती रहेंगी और यदि हमने अब भी आँखें मूँदी रहीं, तो सच यही है कि यूँ ही मारे जाते रहेंगे ‘भारतवासी’।