बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंसा और इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी आर्मी

बांग्लादेश में हाल के वर्षों में हिंसा और अस्थिरता का एक नया रूप उभरकर सामने आया है, जिसकी सबसे स्पष्ट पहचान “इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी आर्मी” (आईआरए) से होती है। यह संगठन एक कट्टरवादी समूह तो है ही, अब राजनीतिक सत्ता और सामाजिक नियंत्रण का उपकरण बन चुका है। यूनुस प्रशासन के इशारे पर इसका गठन और प्रशिक्षण किया जा रहा है। वरिष्ठ सलाहकार आसिफ महमूद शोजिब भुयान ने स्वीकार किया है कि लगभग 8,850 युवाओं को सात शिविरों में हथियार, ताइक्वांडो और सैन्य प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस संगठन को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और जमात-ए-इस्लामी का समर्थन प्राप्त है। इसका उद्देश्य केवल (इस्‍लाम) मजहबी जागरूकता नहीं, बल्कि हिंसा, भय और गैर-मुस्लिमों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना है।

आईआरए के उदय से स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश दक्षिण एशिया में इस्‍लामि‍क मजहबी कट्टरता और आतंकवाद का संभावित केंद्र बनता जा रहा है। इसका निशाना विशेषकर हिंदू, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय हैं। जिसकी पुष्‍ट‍ि “हिंदू-बौद्ध-ईसाई एकता परिषद” की जुलाई 2025 की रिपोर्ट करती है। इसके अनुसार पिछले 11 महीनों में लगभग 2,442 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हुईं, जिनमें मंदिरों को जलाना, घरों को लूटना और महिलाओं पर यौन हिंसा शामिल है। अगस्त 2024 के पहले दो हफ्तों में सत्ता परिवर्तन के दौरान पुलिस निष्क्रिय रही और भीड़ बेखौफ हुई, जिससे हमलों की संख्या चरम पर पहुंच गई।

मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि हिंसा का सबसे बड़ा शिकार महिलाएँ और बच्चे हैं। “बांग्लादेश अल्पसंख्यक मानवाधिकार कांग्रेस” के अनुसार, 2025 की पहली तिमाही में यौन हिंसा के 342 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 87 प्रतिशत पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियाँ थीं। यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि संगठित प्रयास है, जो गैर-मुस्लिम समुदायों में भय पैदा कर उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर कर रहा है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भी स्वीकार किया है कि “हिंदुओं के घर जलाए जा रहे हैं, मंदिरों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, और धार्मिक स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है।”

यहां ये तथ्‍य भी गौर करने योग्‍य है कि 1951 में बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगभग 22 प्रतिशत थी, जो अब घटकर केवल 7.95 प्रतिशत रह गई है। बौद्ध और ईसाई क्रमशः 0.6 और 0.3 प्रतिशत पर सिमट गए हैं। इसके विपरीत, भारत में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ी और उन्हें समान नागरिक अधिकार और सामाजिक-आर्थिक अवसर मिले। यह स्पष्ट करता है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रूप से दबाया गया है और आईआरए जैसी कट्टरवादी संरचनाएँ इसका नेतृत्व कर रही हैं।

इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी आर्मी का फोकस केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। भारतीय एजेंसियों के अनुसार, उनका असली निशाना भारत है। जमात-ए-इस्लामी के नेताओं ने घोषणा की है कि उनके पास 50 लाख युवा हैं जो “गजवा-ए-हिंद” के तहत भारत के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार हैं। पाकिस्तान और यूनुस प्रशासन के बीच समुद्री संपर्क ने हथियारों की सप्लाई आसान कर दी है, जिससे पूर्वोत्तर भारत के लिए नई सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो बांग्लादेश जल्दी ही एक “फेल्ड स्टेट” बन सकता है और दक्षिण एशिया में आतंकवाद का नया अड्डा बन सकता है।

यह हिंसा वैचारिक त्रासदी की ओर भी इशारा करती है। यदि इस्लाम शांति का धर्म है, तो बार-बार इसके नाम पर हिंसा, नफरत और दमन क्यों बढ़ रहे हैं? यह सवाल धर्म की आलोचना नहीं, बल्कि उस सोच की पड़ताल है जिसने धर्म को सत्ता का औजार बना दिया है। जब धार्मिक चेतना का उद्देश्य आत्मशुद्धि से हटकर राजनीतिक प्रभुत्व बन जाए, तब वह समाज और मानवता के लिए खतरा बन जाती है। बांग्लादेश में यही खतरा अब वास्तविकता बन चुका है। बुद्धिजीवी और अन्य लोग, जो इस्लाम को अहिंसक मानते हैं, उन्हें खुलकर इसका विरोध करना चाहिए।

यहां आज इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी आर्मी जैसी हिंसक गतिविधियाँ स्पष्ट करती हैं कि राजनीतिक इस्लाम का लक्ष्य केवल आस्था नहीं, बल्कि सत्ता और सामाजिक नियंत्रण है। इतिहास में मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में गैर-मुस्लिमों के दमन को सत्ता संरचना का हिस्सा बनाया गया। यही प्रक्रिया अब यूनुस शासन में देखने को मिल रही है। गहराई से समझे इसे; बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह केवल धार्मिक उग्रवाद नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक विघटन और राजनीतिक इस्लाम का चरम रूप है। सत्ता पूरी तरह इस्लामिक बन चुकी है, और गैर-मुस्लिम समुदाय इसके सबसे पहले शिकार हैं। नजीह आयूबी की पुस्तक Political Islam: Religion and Politics in the Arab World इस विषय पर महत्वपूर्ण संदर्भ देती है। इसमें राजनीतिक इस्लाम के इतिहास, सिद्धांत और प्रभाव की व्यापक व्याख्या की गई है। हालांकि ब्रिटानिका में भी राजनीतिक इस्लाम पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध है, जो इसका इतिहास, सिद्धांत और प्रभाव समझाती हैं। इनके साथ ही इतिहासकार एवं लेखक शंकर शंरण की भी अनेक पुस्‍तकें एवं लेख उपलब्‍ध हैं, जो इस्‍लाम के राजनीतिक संदर्भों को समझाते हैं।

वस्‍तुत: राजनीतिक इस्लाम एक ऐसी धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा है जो इस्लाम को शासन और समाज की सभी गतिविधियों में केंद्रीय मानती है। यह अस्थिर सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से प्रभावी होता है और अपने मजहबी आधार का व्यापक प्रयोग करता है। आयुबी का तर्क है कि राजनीतिक इस्लाम आधुनिक आंदोलन है, जिसकी शुरुआत पहले विश्व युद्ध के बाद हुई। इसके नेतृत्व में युवा, शिक्षित और शहरी लोग शामिल रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक इस्लाम पहले की तुलना में अधिक मजहब आधारित है और इसका लक्ष्य शासन को (धार्मिक) मजहबी बनाना है। यह आंदोलन राज्य व्यवस्था, सामाजिक मानदंड और राजनीति के बीच नई संरचना स्थापित करने का प्रयास करता है। राजनीति को धर्म के अधीन करने के इस प्रयास ने समाज और राजनीति दोनों पर गहरा प्रभाव डाला है।

कहना होगा कि जब धर्म का उपयोग सत्ता और प्रभुत्व के साधन के रूप में किया जाता है और संयम और करुणा से हट जाता है, तब यह सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता बन जाता है। आज बांग्लादेश इसी विफलता की कहानी बनता जा रहा है। यदि इसे रोका नहीं गया तो आने वाले दशक में वहाँ से फैलने वाली नफरत की लहर पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और इस्लामिक जगत के बुद्धिजीवियों को समझना होगा कि यदि इस वैचारिक हिंसा के खिलाफ आवाज नहीं उठाई गई, तो यह आग सबकुछ जला देगी। भारत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को खासकर आज अधिक सतर्क रहने की आवश्‍यकता है।