महिला किसानों काे दिया जैविक खेती का प्रशिक्षण
प्रशिक्षण के दौरान डॉ. आदित्य वर्मा ने मोटे अनाजों की प्राकृतिक खेती के संबंध में विशेष सत्र में जरूरी जानकारियां दीं। उन्होंने रागी की खेती, उसके पोषण मूल्य और बाजार में बढ़ती मांग के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि महिलाएं यदि मोटे अनाजों की खेती को अपनाती हैं तो वे अपने परिवार को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ अतिरिक्त आय भी कमा सकती हैं।
प्रशिक्षण के चौथे दिन विशेष गतिविधियों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रार्थना से हुई और इसके बाद प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। प्रशिक्षक लाखन सिंह ने हिंग आधारित दवा बनाने और उसके उपयोग की विधि समझाई। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार जैविक उत्पादों को सीधे बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त गाय के गोबर से बने सुगंधित उपले तैयार करने की प्रक्रिया भी सिखाई गई, जिन्हें चंदन और हवन सामग्री मिलाकर पूजा के लिए बेचा जा सकता है। प्रशिक्षण में महिला किसानों को मोटे अनाजों की खेती, जैविक उत्पादन की तकनीक, उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की रणनीतियां और पारंपरिक तौर-तरीकों से बने उत्पादों के उपयोग के बारे में विस्तार से बताया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत विशेषज्ञों ने महिलाओं को न केवल खेती के गुर सिखाए, बल्कि उनके आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को भी बढ़ावा दिया।
महिलाओं को शुद्ध दूध और घी की पहचान करने के सरल उपाय भी बताए गए। इससे वे न केवल स्वयं के उपभोग के लिए गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री का चुनाव कर पाएंगी, बल्कि बाजार में शुद्ध उत्पाद उपलब्ध कराने में भी योगदान दे सकेंगी। कार्यक्रम के समापन पर परियोजना समन्वयक शिप्रा ने कहा कि प्रशिक्षण में सीखी गई बातों को व्यवहार में लाना आवश्यक है, तभी ग्रामीण स्तर पर सकारात्मक बदलाव संभव होगा। उन्होंने महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका निभाने और गांवों में अन्य किसानों को भी इस दिशा में प्रेरित करने पर जोर दिया।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम महिला किसानों के लिए न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता और अतिरिक्त आय की दिशा में ठोस कदम बढ़ाने का अवसर भी प्रदान किया।









