गौवंश को सबसे अधिक प्रभावित करता है लम्पी रोग, सुरक्षित करने को पशु पालक समुचित करें उपाय: डॉ शिवनाथ यादव
उन्होंने बताया कि इन दिनों लम्पी स्किन डिजीज अब पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी तेजी से फैल रहा है। यह एक विषाणु जनित रोग है जो गोवंश को मुख्य रूप से प्रभावित करता है। हालांकि इसका प्रभाव अब भैंस, भेड़ बकरी में भी कहीं-कहीं इसका प्रकोप देखने को मिला है । इसके अतिरिक्त जंगली पशु जिराफ में भी देखा गया है।
जाने कैसे फैलता है लम्पी रोग, क्या है इसके लक्षण
डॉ. शिवनाथ यादव ने बताया कि लम्पी स्किन डिजीज एक कीटों,मच्छरों के द्वारा, या खून चूसने वाले कीड़ों के द्वारा फैलने वाली बीमारी है। परन्तु संक्रमित पशु के नाक एवं मुख के स्राव से चारा पानी में मिलकर एवं नर पशु के वीर्य से भी दूसरे पशुओं को हो सकता है।
इस बीमारी से प्रभावित पशु को तेज बुखार होता है। चमड़ी पर छोटी-छोटी गांठे निकल आती है जिसका साइज 0.5 सेंटीमीटर से लेकर 5 सेंटीमीटर तक होती है। त्वचा के अतिरिक्त यह मुंह नाक आंख के म्यूकस मेंब्रेन पर भी प्रभाव डालती है। बीमारी पशुपालक को आर्थिक क्षति पहुँचाती है । बीमार पशु का दूध कम हो जाता है।
लम्पी की शिकायत आते ही प्रभावित होते है पशु मेले
डा. यादव ने बताया कि यह बीमारी फैलने की दशा में पशु मेलों पर प्रतिबंध लग जाता है । इसलिए पशु क्रय विक्रय रुक जाने के कारण पशुपालकों को आर्थिक क्षति होती है। जिन पशुओं को यह बीमारी प्रभावित करती है, उनके चमड़े की कीमत भी कम हो जाती है।
इसके नियंत्रण का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है।
स्वच्छता रखने से सुरक्षित रह सकते है गोवंश
डॉ. यादव ने बताया कि इस रोग के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि पशु शाला के आसपास साफ सफाई रखकर, झाड़ियां को काटकर एवं उसमें पनपने वाले वाले खून चूसने वाली मक्खियों की संख्या को नियंत्रित कर, कीटनाशकों का छिड़काव कर हम रोग पर नियंत्रण कर सकते हैं। प्रभावित पशु को अन्य पशुओं से दूर रखना चाहिए जिससे कि वह उनके लार और झूठे पानी भोजन से बचा रहें ।वायरल बीमारी होने के कारण बीमारी का कोई सटीक प्रभावी दवा नहीं है। लक्षणों के अनुसार ही इस बीमारी से प्रभावित पशु का इलाज किया जाता है।
इसकी शिकायत होते ही नजदीकी पशु चिकित्सालय को दे सूचना
बीमारी से पशु प्रभावित होने पर पशुपालक को अपने नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय एवं पशु सेवा केन्द्र पर संपर्क कर तुरन्त सूचना देनी चाहिए। पशु मित्रों के भरोसे नही रहना चाहिए। अन्यथा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता हैं। बीमारी से बचाव के लिए पशुओं की इम्युनिटी (प्रतिरोधक ) क्षमता बढ़ाने के लिए अपने पशु को संतुलित पशु आहार एवं खनिज मिश्रण देना चाहिए।
देसी दवाइय के प्रयोग से कुछ सीमा तक पा सकते है नियंत्रण
डॉ.शिवनाथ यादव ने बताया कि आंशिक रूप से प्रभावित पशुओं को देसी दवाइयों के प्रयोग से कुछ सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। “पान के 10 पत्ते, काली मिर्च, 10 ग्राम नमक, 10 ग्राम तुलसी के पत्ते, 10 तेजपत्ते, 10 ग्राम हल्दी, नीम की पत्ती एक मुट्ठी और बेलपत्र एक मुट्ठी को मिलाकर कूट कर पेस्ट बना लें। इसमें गुड मिला करके प्रतिदिन तीन बार में प्रभावित पशुओं को खिलाएं। अप्रभावित पशुओं को खिलाने से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।
उन्होंने बताया कि होम्योपैथिक दवाइयां भी बीमारी से बचाव रोकथाम एवं नियंत्रण में कारगर पाई गई है। जिस भी किसी पशुपालक भाई की गाय को ये समस्या है वे आर्सेनिक 200, बैलाडोना 200, थूजा 200 लाये और खाली पेट या खाना पचने के बाद सुबह शाम रोटी के छोटे से टुकड़े पर तीनों दवाइयों की 5—5 बूंद डालकर गाय को खिलाये।
लम्पी के लक्षण
डॉ. शिवनाथ ने बताया कि इस बीमारी से प्रभावित पशु के त्वचा पर छोटी-छोटी गांठ निकल आती हैं, जो बाद में फूट जाती है और घाव बन जाता है। इस बात की पूरी संभावना होती है कि घाव पर मक्खियों अंडा दे देती है और उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए पशु के शरीर को नीम की पत्तियां उबालकर धोएं । उसके घाव पर एलोवेरा पत्ती का गूदा जेल लगाएं । इसके बाद भी यदि स्थिति नियंत्रण में नहीं होती है, घाव ठीक नहीं होते हैं तो अपने नजदीकी पशु चिकित्सा अधिकारी से संपर्क कर परामर्श लें और एलोपैथिक दवाइयां का प्रयोग करें।









