भीषण आपदा के बीच ब्राह्मण बोर्ड का गठन करना दुर्भाग्यपूर्ण: शांता कुमार
शांता कुमार ने मंगलवार काे जारी एक बयान में कहा कि हिमाचल प्रदेश इस समय इतिहास की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। बादल फटने की घटनाएं लगातार हो रही हैं, सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, हजारों घायल हैं और सैकड़ों लोग अब भी मलबे में दबे हैं। हजारों परिवार अपने घर-परिवार गंवा चुके हैं और आंखों में आंसू लिए जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
इसी बीच, बीते साेमवार काे राज्य सरकार ने एक ब्राह्मण कल्याण बोर्ड का गठन कर 126 गैर-सरकारी और 14 सरकारी सदस्यों सहित कुल 140 सदस्यों को शामिल किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शांता कुमार ने कहा कि जब मैंने यह खबर में पढ़ी तो यकीन नहीं हुआ। फिर चार अन्य अखबारों को देखा, पर कहीं खबर नहीं थी। लगा कि शायद गलती से छप गई हो, लेकिन जब एक अन्य समाचार पत्र में भी वही खबर देखी तो बेहद शर्मिंदगी महसूस हुई। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आज की भीषण आपदा के समय इससे बड़ा मूर्खतापूर्ण फैसला और कोई नहीं हो सकता। जब पूरा प्रदेश राहत और पुनर्वास की बाट जोह रहा है, ऐसे में इस तरह की फिजूलखर्ची के फैसले भी राज्य की बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने हिमाचल विधानसभा में कुछ सदस्यों की सकारात्मक पहल की सराहना करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता के नेतृत्व में सभी दलों को मिलकर केंद्र सरकार से मदद की मांग करनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और सभी सांसदों को दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मुलाकात कर आपदा प्रभावितों के लिए भूमि और सहायता की मांग करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि हिमाचल में अधिकांश भूमि वन क्षेत्र घोषित हो चुकी है, यहां तक कि जहां केवल घास उगती है, वह भूमि भी वनभूमि घोषित है। इस कारण पीड़ितों के लिए मकान बनाने के लिए जमीन उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। शांता कुमार ने केंद्र सरकार से दो लाख करोड़ रुपये की उस धनराशि के उपयोग की मांग दोहराई है, जो बैंकों और एलआईसी में उन लोगों का पड़ा है जिनके कोई कानूनी वारिस नहीं हैं। उन्होंने कहा, “मैंने पहले ही प्रधानमंत्री को इस संदर्भ में सभी बैंकों और एलआईसी की पूरी सूची के साथ पत्र भेजा था। यह धन देश का है और परलोक से कोई वारिस इसे लेने नहीं आएगा।” उन्होंने मांग की कि इस धन में से पांच हजार करोड़ रुपये हिमाचल की आपदा राहत के लिए दिए जाएं और केंद्र सरकार इसके लिए उचित कानून बनाए।









