शहजादी की तरह सजा: खाड़ी देशों में छोटे जुर्म पर हाथ काटने से मौत तक की सजा!
उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद से आने वाली शहजादी को 15 फरवरी को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अबु धाबी स्थित अल बाथवा जेल में फांसी की सजा दी गई। शव के बारे में परिवार को 15 दिन बाद हुई जानकारी ने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया। शहजादी का अंतिम संस्कार 5 मार्च को अबु धाबी में किया गया है, जहां उसकी कब्र का नंबर A7S1954 है। इस मामले ने कई प्रश्न खड़े किए हैं, खासकर हाई-रिस्क वर्किंग कंडीशंस से जुड़े मुद्दे पर।
शहजादी का मामला पहली बार नहीं है, इससे पहले भी 54 भारतीयों को यूएई और अन्य खाड़ी देशों में मृत्युदंड सुनाया गया है। खाड़ी देशों में कानून बहुत सख्त हैं, जहां छोटी-छोटी चोरियों के लिए भी कटने की सजाएं दी जाती हैं। यह तथ्य चौंकाने वाला है, क्योंकि यूपी के कई निवासी खाड़ी देशों में रोजगार के लिए जाते हैं और यही उनके परिवार की आय का मुख्य स्रोत बनता है। ऐसे में इन सख्त कानूनों के बावजूद क्यों लोग इन देशों में नौकरी के लिए जाने के लिए तैयार होते हैं, यह समझना जरूरी है।
खाड़ी देशों से भारत में भेजी जाने वाली कुल राशि का लगभग 50% हिस्सा इन देशों से ही आता है। इस तथ्य को देखते हुए, स्पष्ट है कि भारतीय प्रवासियों के लिए ये देश आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन साथ ही यह खतरनाक भी है। खाड़ी देशों की सख्त कानून व्यवस्था और मानवाधिकार के मुद्दे पर चिंता जताई जा रही है। शहजादी का मामला इन सब मुद्दों पर रोशनी डालता है और प्रवासी भारतीयों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
हाल ही में आए इस घटनाक्रम ने लोगों में आक्रोश पैदा किया है और शहजादी के परिवार को गहरा दुख पहुंचाया है। उन्हें शव न मिलने का दुख तो है ही, साथ ही साथ इस बात का भी भय है कि उनकी बेटी के जैसे अन्य भारतीय भी इन देशों में सख्त कानूनों का शिकार बन सकते हैं। परिवार को अब केवल सोशल मीडिया और स्थानीय समाचारों के द्वारा ही शहजादी की कब्र की तस्वीरें मिली हैं, जिससे उनकी पीड़ा और बढ़ गई है।
सरकार तथा सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे प्रवासी भारतीयों के कानूनी अधिकारों और सुरक्षा पर ध्यान दें। यह आवश्यक है कि ऐसी घटनाओं से बचने के लिएां प्रावधान बनाए जाएं, ताकि आगे से किसी और परिवार को इस तरह का दुख न झेलना पड़े। इस मामले में न्याय की मांग भी उठाई जा रही है, और यह अपेक्षित है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस संदर्भ में अधिक सक्रियता दिखाएं।









