भारत गुरू प्रदत्त शिक्षा व शिक्षण से बना था विश्व गुरू, गुरू वगैर ज्ञान अधूरा: सुशील दास जी महाराज

भारत गुरू प्रदत्त शिक्षा व शिक्षण से बना था विश्व गुरू, गुरू वगैर ज्ञान अधूरा: सुशील दास जी महाराज

महाकुम्भ नगर,20 फरवरी (हि.स.)। हम अपनी संस्कृति जो अपने—आप में पूर्ण विज्ञान या वैज्ञानिक है से कट रहे हैं और पश्चिमीकरण हो रहा है। भारत में दो तरह शिक्षा व्यवस्था समानांतर चल रही है। एक सरकारी दूसरी कान्वेंट जो देश की आजादी के 75 वर्ष बाद भी अपनी शिक्षा अपनी भाषा में नहीं दे पा रहे है। जबकि पहले भारत में गुरु प्रदत्त शिक्षा—शिक्षण से विश्व गुरु बना था, गुरू बिन अज्ञान—ज्ञान अविद्या, अशिक्षा, शिक्षा का निराकरण नहीं हो सकता। यह बात गुरूवार को महाकुम्भ प्रयागराज के सेक्टर एक में स्थित शिविर में संत सुशील दास जी महाराज ने कही।

उन्होंने कहा कि सकारात्मक परिवेश जो हमें अपनी शिक्षा की कमी कहां है, क्या है जानने, जानकर उसे दूर करने के लिए चुनौती दे रहा है। अगर आज हम 75 वर्षों में गलत शिक्षण से परिणाम पर नजर डाले तो हमारा नैतिक और बौद्धिक पतन अत्यधिक हुआ है। अत: हमारे नीति नियंताओं को चाहिए कि वह देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्राथमिक शिक्षण का यर्थार्थ सही अर्थ लागू करें, ताकि भारतीय जनमानस की सही सीखने की क्षमता से सही, सकारात्मक चिंतन या विचार करने योग्य बनाएं तभी हमारी उच्च शिक्षा तक पहुँच बनेंगी व देश सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगा। वर्तमान में हमें समझना चाहिए कि शिक्षा का अर्थ, गुरु से अधिक और गुरु में है। हम गुरु से हटकर जो शिक्षण थोप रहें है वह हमारे अपने पैरों को कुल्हाड़ी से मारने जैसे है।

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