बस्तर दशहरा के विजय रथ में रथारुढ़ बस्तर महाराजा उडाया करते थे विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी
बस्तर दशहरा के विजय रथ में रथारुढ़ बस्तर महाराजा उडाया करते थे विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी
जगदलपुर, 12 अक्टूबर (हि.स.)। बस्तर दशहरे की इंद्रधनुषी रंगों वाली कई रस्में अब अतीत के पन्नों में ही दर्ज हो कर रह गईं हैं। पक्षी नीलकंठ को बस्तर दशहरा के रथ में रथारुढ़ बस्तर महाराजा द्वारा उड़ाने की एक ऐसी ही रस्म का उल्लेख लेखक रुद्रनारायण पाणिग्राही ने अपनी किताब बस्तर दशहरा में किया है। किताब पेज 99 में बताया गया है कि विजयादशमी के दिन पूरी की जाने वाली भीतर रैनी रथ परिक्रमा पूजा विधान के दौरान विजय रथ पर आरूढ़ बस्तर महाराजा अपने हाथों से नीलकंठ पक्षी को खुले आसमान में उड़ाते थे। उड़ाए जाने वाले इस नीलकंठ पक्षी का इंतजाम बस्तर रियासत के ग्रामीणें के जिम्मे था। वैसे भी बस्तर दशहरे की एक और प्रथा बगुला उड़ाने की बतायी जाती है। इसमें विजय रथ के दोनों छोर पर कपड़दार तैनात होते हैं जो लंबे कपड़े के एक छोर पर गांठ बांध कर उसे हवा में उपर की ओर उछालता और फिर बटोरता था। इसे ही बगुला उड़ाने का विधान कहा जाता था, यह परंपरा आज भी विजय रथ की परिक्रमा के दाैरान देखा जा सकता है। बताया जाता है इस परंपरा का निर्वहन रैला और काछन देवी के सम्मान में किया जाता है। बस्तर के संस्कृति परंपरा के जानकार व लेखक रुद्रनारायण पाणिग्राही ने बताया कि विजयादशमी के दिन भीतर रैनी रथ परिक्रमा पूजा विधान के दौरान विजय रथ पर आरूढ़ अंतिम बस्तर महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव तक नीलकंठ पक्षी को उड़ाने की इस परंपरा का निर्वहन किया जाता था।
जनश्रुति व पुराणों के अनुसार- नीलकंठ के विजयादशमी के दिन दर्शन को लेकर कई तरह की जनश्रुतियां प्रचलित हैं। कोई मानता है कि नीलकंठ भगवान शिव का दूत है जिसके दर्शन से परिवार में सुख-शांति और संपन्नता आती है। कोई दशहरे पर इसके दर्शन को शुभ मानता है। ग्रमीण तो इसे अपना पर्यावरणीय मित्र मानते हैं क्योंकि नीलकंठ उनके खेतों के कीट पंतगों को आहार बना कर उनकी फसलों की रक्षा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। समुद्र मंथन के दौरान, जब देवताओं और राक्षसों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन किया, तो उससे निकले विष को पीकर भगवान शिव ने संसार का कल्याण किया, इसी कारण भगवान शिव काे नीलकंठ भी कहा जाता है। विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी का दिखना एक शुभ संकेत माना जाता है। मान्यता है कि नीलकंठ पक्षी के दर्शन से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सफलता मिलती है। पुराणों के अनुसार रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम पर ब्राह्मण हत्या का पाप लगा, इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान राम ने भगवान शिव की आराधना की। भगवान श्रीराम को इस पाप से मुक्त कराने के लिए भगवान शिव नीलकंठ पक्षी के रूप में प्रकट हुए थे। इसी मान्यता के कारण दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ माना जाता है ।
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