विधानसभा में भूमिधरी नियम और वन अधिकारों पर हुई बहस
भराड़ीसैंण, 11 मार्च । उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान बुधवार को भूमिधरी वनभूमि पर दशकों से निवास कर रहे परिवारों के अधिकार, राजस्व ग्राम घोषणा और पीठ के निर्देशों के पालन को लेकर सदन में तीखी बहस हुई। विपक्षी सदस्यों ने सरकार से स्पष्ट नीति और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की।
बुधवार काे सदन में नियम 58 के तहत कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह ने कहा कि प्रदेश के कई क्षेत्रों में लोग वर्षों से निवास कर रहे हैं, लेकिन राजस्व अभिलेखों में स्थिति स्पष्ट न होने के कारण वे मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। उन्होंने बताया कि 19 फरवरी 2024 को नैनीताल क्षेत्र के कुछ गांवों को राजस्व ग्राम घोषित करने की घोषणा हुई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्रवाई अब तक पूरी नहीं हो सकी है। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से हस्तक्षेप कर पात्र निवासियों को भूमिधरी अधिकार दिलाने की मांग की।
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि भूमिधरी नियम 58 और वनभूमि से जुड़े मामलों में प्रशासनिक अस्पष्टता के कारण हजारों परिवारों पर बेदखली का खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने वर्ष 1980 के वन संरक्षण कानून और वर्ष 2006 के वन अधिकार कानून की भावना के अनुरूप पारंपरिक वनवासियों को राहत देने की आवश्यकता बताई। सदन में यह भी उल्लेख किया गया कि कई परिवार 1950 के दशक से वनभूमि पर निवास कर रहे हैं और तीन पीढ़ियां गुजर चुकी हैं। ऐसे मामलों में मानवीय एवं विधिक संतुलन बनाते हुए समाधान निकाले जाने की मांग की गई।
इसी दौरान प्रीतम सिंह ने पीठ से दिए गए निर्देशों के पालन पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में दिए गए निर्देशों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने सुझाव दिया कि लंबित मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए समिति गठित की जाए।
सरकार की ओर से आश्वासन दिया गया कि संबंधित प्रकरणों की समीक्षा कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।









