ram-katha-vijendragupta

शांति, संवाद और नैतिक नेतृत्व का मंच है रामकथा: विजेंद्र गुप्ता

नई दिल्ली, 18 जनवरी । दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने रविवार को कहा कि रामकथा केवल अतीत का आख्यान नहीं है; यह भविष्य के लिए नैतिक मार्गदर्शन और विश्व शांति का आह्वान है। ऐसे समय में जब विश्व युद्ध, हिंसा और गहरे विश्वास संकट का सामना कर रहा है, प्रभु श्रीराम का जीवन और आदर्श हमें यह स्मरण कराते हैं कि सच्चा नेतृत्व चरित्र, करुणा, संयम और नैतिक साहस में निहित होता है।

विजेंद्र गुप्ता आज यहां भारत मंडपम में 17 से 25 जनवरी तक आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के शुभारंभ अवसर पर संयोजक के रूप में संबोधित कर रहे थे। यह रामकथा प्रतिदिन प्रातः 10:00 बजे से आयोजित की जा रही है।

यह रामकथा आचार्य लोकेश मुनि जी द्वारा स्थापित अहिंसा विश्व भारती के तत्वावधान में विश्व शांति केंद्र मिशन के अंतर्गत आयोजित की जा रही है। आध्यात्मिक गुरु एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रामकथा वाचक मोरारी बापू कथा का प्रवचन कर रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आयोजन समिति के अध्यक्ष हैं।

विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि श्रीराम कथा ऐतिहासिक रूप से नैतिकता, भ्रातृत्व और मानवता के मूल्यों के प्रसार का सशक्त माध्यम रही है और यह भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का अविभाज्य अंग है। रामकथा भारत की जीवंत सभ्यता का प्रतीक है, जहां आध्यात्मिकता और शांति-निर्माण अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे में गहराई से जुड़े हुए हैं। प्रभु श्रीराम का जीवन यह सिखाता है कि शक्ति सेवा के लिए होती है, त्याग ही वास्तविक शक्ति है और धर्म केवल कर्मकांड नहीं बल्कि नैतिक साहस है- ये सिद्धांत आज के सार्वजनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि मोरारी बापू ने दशकों से भारत और विश्व के विभिन्न देशों में रामकथा के माध्यम से मानवता का संदेश समाज के मूल में पहुंचाया है।

प्रतिष्ठित कथा वाचक मोरारी बापू ने अपने संबोधन में कहा कि रामकथा मानवता के साथ एक जीवंत आध्यात्मिक संवाद है, जो करुणा, आत्मचिंतन और नैतिक उत्तरदायित्व को जागृत करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन सामंजस्य, संयम और सहानुभूति का शाश्वत मार्गदर्शन प्रदान करता है तथा संघर्ष और विभाजन से चिह्नित वर्तमान युग में रामकथा को विश्व शांति के मिशन से जोड़ना समयोचित और आवश्यक है।

अहिंसा विश्व भारती और विश्व शांति केंद्र के संस्थापक जैन संत आचार्य लोकेश मुनिजी ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन धर्म किसी एक संप्रदाय का नाम नहीं बल्कि एक शाश्वत और सार्वभौमिक सिद्धांत है, जो मानवता का मार्गदर्शन करता है। सनातन चेतना वह एकीकृत सभ्यतागत शक्ति है, जो हिन्दू, जैन, सिख, बौद्ध और अन्य आस्था परंपराओं को करुणा, संयम और नैतिक जीवन मूल्यों पर आधारित साझा ढांचे में बांधती है।