असंवैधानिक है कुर्मी-कुड़मी को आदिवासी का दर्जा देने की मांग : चन्द्र प्रभात मुंडा

रैली का मुख्य उद्देश्य झारखंड में कुर्मी-कुड़मी समाज की ओर से तथ्यों और दस्तावेजों के आधारहीन तर्कों के जरिए आदिवासी (एसटी) दर्जे की मांग का विरोध करना था। प्रतिभागियों ने कहा कि यह मांग असंवैधानिक है और झारखंड की मूल आदिवासी अस्मिता के साथ छेड़छाड़ का प्रयास है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता समन्वय समिति के अध्यक्ष चन्द्र प्रभात मुण्डा ने की, जबकि संचालन उपाध्यक्ष सुरजू हस्सा ने किया। वक्ताओं ने कुड़मी समाज की ओर से प्रसारित किए जा रहे कथनों और दस्तावेजों को “फर्जी व भ्रामक” बताते हुए कहा कि इनसे झारखंड की सामाजिक सद्भावना को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

अध्यक्ष चन्द्र प्रभात मुण्डा ने कहा कि कुछ तथाकथित कुड़मी नेता बाहरी पूंजीपतियों के इशारे पर राजनीतिक लाभ के लिए अपने ही समाज को भ्रमित कर रहे हैं। इससे झारखंड की सौहार्दपूर्ण संस्कृति को ठेस पहुंच रही है। आज की यह ऐतिहासिक रैली झारखंड की एकता और आदिवासी अस्मिता को बचाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

कार्यक्रम में महाराष्ट्र के नागपुर से आए वक्ता प्रेम गेंडाम ने कहा कि 1965 की लुकुर समिति की ओर से निर्धारित मानदंडों के अनुसार कुड़मी समुदाय किसी भी स्थिति में अनुसूचित जनजाति (एसटी) की परिभाषा में नहीं आता, न ही उनका डीएनए आदिवासी समुदायों से मेल खाता है। उन्होंने कहा कि झारखंड का माहौल बिगाड़ने के प्रयासों का डटकर विरोध किया जाएगा।

लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि 1871-72 से अब तक हुई किसी भी जनगणना या दस्तावेज में कुड़मी समुदाय का नाम एसटी सूची में दर्ज नहीं है। वे नागवंशी शासन काल में छोटानागपुर आए और कई आदिवासी गांवों पर कब्जा किया।

सभा को पड़ाहा राजा सोमा मुण्डा, मार्शल बरला, अलेस्टर बोदरा, सनिका भेंगरा और अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासियों के हक और अधिकार की रक्षा केवल सामाजिक एकजुटता और संगठित आंदोलन से ही संभव है।

कार्यक्रम में प्रशासनिक पदाधिकारियों और युवाओं ने विधि-व्यवस्था बनाए रखने में सक्रिय सहयोग दिया। आयोजन की सफलता में जिले भर के ग्राम प्रधान, पाहन, सामाजिक कार्यकर्ता, महिलाएं और बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए।