पीएम मोदी व गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ दायर याचिका खारिज, पचास हजार का लगाया हर्जाना भी
अदालत ने कहा कि न्याय पाने के अधिकार को गलत याचिका दायर करने के लाइसेंस के रूप में इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जा सकती। वहीं एक अधिवक्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह किसी भी मुकदमे को शुरू करने से पहले जनहित में उसकी तथ्यों को सत्यापित करे। इसके साथ ही उसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए सनकी तरीके से कार्य नहीं करना चाहिए। इसके अलावा केवल याचिकाकर्ता की शिकायत पर यह नहीं माना जा सकता कि नागरिकता संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद अव्यवस्था की स्थिति पैदा हुई है। याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप न केवल पक्षकारों की छवि को धूमिल करने वाले हैं, बल्कि सांप्रदायिक हिंसा पैदा करने का भी एक प्रयास है।
याचिका में कहा गया कि नागरिकता संशोधन कानून संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है और इसे मुस्लिम व धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के लोगों पर अत्याचार करने के इरादे से लाया गया है। कानून के कारण देश में वैमनस्यता का माहौल बन गया है। इस संबंध में उसने पीएम, गृह मंत्री और तत्कालीन कानून मंत्री के खिलाफ निचली अदालत में परिवाद दिया था, लेकिन अदालत ने उसे खारिज कर दिया। इसके विरोध में केन्द्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एएसजी आरडी रस्तोगी ने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून किसी भी धर्म का विरोधी नहीं है। वहीं देश में बनने वाला कोई भी कानून गृह मंत्री, कानून मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं बनाते हैं। कानून संसद की ओर से बनाया जाता है। ऐसे में पीएम मोदी और दोनों मंत्रियों पर आरोप लगाना गलत है। याचिकाकर्ता ने कानून का दुरुपयोग किया है। ऐसे में उसकी याचिका को भारी हर्जाने के साथ खारिज किया जाना चाहिए। दूसरी ओर महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जो मुद्दा उठाया है, वह संबंधित निचली अदालत के क्षेत्राधिकार में नहीं आता है। इसलिए निचली अदालत ने परिवाद को खारिज कर कोई गलती नहीं की है।









