आतंकवाद पर सहानुभूति : न्याय के बीच एक जरूरी सवाल

पीडीपी प्रमुख और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखा गया पत्र, जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के नेता यासीन मलिक के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। महबूबा मुफ्ती का तर्क यह है कि मलिक ने हिंसा छोड़कर राजनीतिक मार्ग अपनाया है और वे गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं इसलिए उनके कष्टों पर विचार होना चाहिए। वस्‍तुत: यह सिर्फ एक राजनीतिक निवेदन भर नहीं है; यह हमारे नैतिक विवेक, न्याय के सिद्धांत और पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता का बड़ा परीक्षण भी है कि क्‍या आतंकवादियों पर दया दिखाना उचित है?

यासीन मलिक की आतंकवादी गतिविधियों का सबसे प्रमुख और जाना-माना मामला 1989 में हुए रुबैया सईद अपहरण से जुड़ा है। उस वर्ष 8 दिसंबर को जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद को किडनैप कर लिया गया था। रुबैया उस वक्त मेडिकल इंटर्न थीं और हॉस्पिटल से अपने घर जा रही थीं, तभी उन्हें एक बस में जबरन उतार कर जेकेएलएफ के आतंकवादियों ने अगवा कर लिया। यह अपहरण पूरी तरह योजनाबद्ध था, जिसमें यासीन मलिक की मुख्य भूमिका मानी जाती है। रुबैया सईद ने कोर्ट में प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से यासीन मलिक को अपने अपहरणकर्ताओं में एक के रूप में पहचाना है।

इस अपहरण के बदले में आतंकवादियों ने पांच आतंकियों की रिहाई की मांग की थी, जिन्हें सरकार को छोड़ना पड़ा था। यह घटना न केवल जम्मू-कश्मीर में तनाव की आग भड़काने वाली साबित हुई बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी एक बड़ी चुनौती थी। यासीन मलिक के खिलाफ अन्य गंभीर आरोपों में 1990 में भारतीय वायुसेना के कुछ अधिकारियों पर हमला शामिल है। इसके अलावा वह राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के 2017 के आतंकी वित्तपोषण मामले में भी आरोपी हैं। इन मामलों में मलिक को उम्रकैद की सजा मिली है और वह वर्तमान में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। सजा के बावजूद यासीन मलिक की गतिविधियां और उनके समर्थकों की कई बार मानवीय दृष्टिकोण से उनकी रिहाई की मांग उठती रही है, जिस पर राजनीतिक विवाद भी होता रहा है। पर हकीकत यही है कि यासीन के खिलाफ लगे गंभीर आरोप और आतंकवादी गतिविधियों की गवाही इसकी गंभीरता दर्शाती है ।

सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी की कथित ‘बदली हुई’ पहचान और बीमारी उसके पूर्वकृत्यों की स्मृतियों को मिटा देती है? क्या सहानुभूति का मतलब अपराधों के नकारात्मक प्रभावों को भुला देना हो सकता है? वास्‍तव में जो इस तरह की मानवीयता के आधार पर आतंकवादियों का समर्थन करते हैं, उन्‍हें नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवाद केवल कानूनी शब्दावली का मसला नहीं है, यह मानवता के विरुद्ध एक हिंसक हमला है। जब आतंकवादी निर्दोष नागरिकों, महिलाओं, बच्चों और सुरक्षा बलों पर हमले करते हैं, तब किसी भी समाज का तंत्र सुरक्षा संकट का सामना करता है।

उन परिवारों की जिंदगियाँ बिखर जाती हैं जिनके अपनों को खोया गया। 26/11 मुंबई हमला, पुलवामा जैसे हमले और लंबे वर्षों से कश्मीरी सन्दर्भ में हुए अनगिनत रक्तरंजित मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का परिणाम केवल एक व्यक्तिगत अपराध नहीं होता, यह पूरे समाज की आस्था और सुरक्षा पर चोट करता है। इन हत्याओं से जुड़े जख्मों का इलाज सिर्फ शब्दों से, या किसी नेता की सहानुभूति से नहीं हो सकता है, इसके लिए न्याय प्रक्रिया, जवाबदेही और पीड़ितों के अधिकारों की संवेदनशील रक्षा अनिवार्य है।

यासीन मलिक जैसे मामलों में दो अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़ी बातें सामने आती हैं, एक राज्य की यह जिम्मेदारी थी कि वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए दोषियों को ऐसी सजा दिलवाने की पहल करता, जो कानून के अनुरूप होती। दूसरा- समाज की यह नैतिक जिम्मेदारी कि वह पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ खड़ा रहे। यह होना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति की बीमारी या किसी भी वक्त के पश्चात् अपनाया गया राजनीतिक रास्ता, अनसुलझे और गंभीर आरोपों की जांच-परख और सम्भवत: दंड प्रक्रिया की जगह नहीं ले सकता। क्या पूर्व अपराधों को केवल इस आधार पर नजरअंदाज किया जा सकता है कि आरोपी ने अब राजनीतिक बहस का रास्ता चुना है?

यह सही है कि किसी भी अपराधी को सुधार का अवसर दिया जाना न्याय व्यवस्था का एक स्तम्भ है, पर आतंकवाद की हद तक पहुँच चुके मामलों में यह प्रश्न उठता है कि क्या वही दमन, हिंसा और निर्दोषों की हत्याएँ ‘सुधार’ के दायरे में आ सकती हैं। जब कोई हिंसा का औजार बन चुका व्यक्ति ऐसी क्रूरता का माध्यम रहा हो, तब पहले यह देखा जाना चाहिए कि उसके खिलाफ दर्ज मामलों की गंभीरता क्या है, क्या तथ्य और साक्ष्य हैं, और क्या वह सच्चाई से सामना करने तथा दायित्व निभाने को तैयार है? सिर्फ कथन से यह तय नहीं होना चाहिए कि अपराधी ने मन बदल लिया है।

हमारे समाज को यह भी याद रखना होगा कि सहानुभूति की भावना अनिवार्य रूप से मानवता का परिचायक है, पर जब यह सहानुभूति उन लोगों के प्रति जताई जाए जिनके कर्मों ने हजारों परिवारों की दुनिया उजाड़ दी हो, तब यह सहानुभूति पीड़ितों के प्रति अन्याय की शक्ल धारण कर लेती है। शत्रुता और हिंसा के अपराध कहाँ खत्म होते हैं और इंसानियत कहाँ फिर से शुरू होती है, यह सीमा स्पष्ट होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक नेता, किसी भी सरकार या किसी भी न्यायिक निकाय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता, त्वरित और निष्पक्ष जांच, पीड़ितों की भागीदारी और कानून के अनुरूप न्याय दिलाने का मार्ग अपनाया जाए।

यहां कुल कहना यही है कि पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर जो मांग प्रतिबंधित जेकेएलएफ सुप्रीमो मोहम्मद यासीन मलिक को मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है, उसका मानवीय आधार ही अनुचित है, क्‍योंकि आतंकवाद का कोई मानवीय आधार नहीं हो सकता है। भले ही यह एक बहस का विषय हो, पर यासीन मलिक जैसे मामलों में सहानुभूति, न्याय और जवाबदेही के सिद्धांतों से ऊपर नहीं उठनी चाहिए। बीमारी और मानवीय कष्ट पर सहानुभूति दिखाना मानवतावादी रवैया है किंतु वह अपराधों की भूल और पीड़ितों के दर्द को मिटाने का औजार नहीं बन सकता।

वास्‍तव में पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की यह सहानुभूति उन परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान है, जिन्होंने अपनी जानें और अपनों को खोया है और यदि उनके कहे अनुसार सरकार सच में इस आतंकवादी को छोड़ती है, तो यह आतंकवाद से पीड़‍ित परिवारों के ऊपर आज सबसे बड़ा अन्याय होगा।