राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी: सेवा, समरसता और पुनरुत्थान का संकल्प
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सौ वर्ष पूरे कर रहा है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इसकी नींव रखी थी। सवाल यह है कि इस संगठन ने भारत के समाज, राजनीति और संस्कृति को क्या दिया और अगले सौ वर्षों में इसकी भूमिका क्या होगी? आलोचक इसे संकीर्ण विचारधारा का संगठन कहते रहे हैं, किंतु समर्थक इसे भारत के सबसे बड़े स्वयंसेवी नेटवर्क के रूप में देखते हैं। तथ्य यह है कि आंकड़े और घटनाएं इसकी व्यापक उपस्थिति और प्रभाव की गवाही देते हैं।
सेवा के आंकड़े और अनुभवः आरएसएस की ताकत उसकी सेवा-परंपरा में दिखती है। कोविड-19 महामारी के दौरान सेवा भारती और संघ के स्वयंसेवकों ने 118 कोविड देखभाल केंद्र और 287 आइसोलेशन केंद्र चलाए। 4,193 प्लाज्मा दान की सुविधा दी गई और हेल्पलाइन पर 88 हजार से अधिक कॉल संभाले गए। 92,656 सेवा स्थलों से 73 लाख राशन किट, 45 लाख भोजन पैकेट और 90 लाख मास्क वितरित हुए। क्या ये महज आँकड़े हैं या यह उस संगठन की क्षमता का प्रमाण है जो बिना सरकारी ढांचे के भी लाखों लोगों तक पहुंच बना सकता है?
देखा जाए तो यह सेवा केवल कोविड तक सीमित नहीं रही। 1947 में विभाजन के समय शरणार्थी शिविरों में मदद, 1962 और 1971 के युद्धों के दौरान सहयोग, 1984 के दंगों में सिखों को शरण और 2001 के गुजरात भूकंप में पुनर्निर्माण का समय क्यों न रहा हो, ये सभी उदाहरण बताते हैं कि संघ संकट की घड़ी में मौन रहकर काम करता है। यही कारण है कि आलोचना के बीच भी समाज के बड़े हिस्से में उसे भरोसे की नजर से देखा जाता है।
संगठन का फैलावः मार्च 2025 तक संघ की शाखाओं की संख्या 83 हजार से अधिक हो चुकी है। इनमें 52 हजार दैनिक और 22 हजार साप्ताहिक शाखाएं शामिल हैं। एक वर्ष में शाखाओं की संख्या में 10 हजार की वृद्धि दर्ज हुई है। यह निश्चित तौर पर संगठनात्मक रूप से सामाजिक आधार की मजबूती का संकेत है।
शताब्दी और पंच परिवर्तनः संघ ने अपनी शताब्दी पर “पंच परिवर्तन” का आह्वान किया है, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण चेतना, स्व और कर्तव्य बोध। सवाल यह है कि क्या ये पांच सूत्र केवल आंतरिक नारे हैं या इन्हें समाज के व्यापक विमर्श में बदलने की क्षमता संघ के पास है? सामाजिक समरसता पर संघ की पहल ध्यान देने योग्य है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति और वंचितों के लिए मंदिर प्रवेश अभियान, हाशिए के वर्गों से पुजारियों का प्रशिक्षण, एकल विद्यालयों के जरिए अजजा बच्चों की शिक्षा ये प्रयास दिखाते हैं कि संघ जातिगत विभाजन के मुद्दे को केवल बहस में नहीं, व्यवहार में भी संबोधित करने की कोशिश कर रहा है।
जाति विमर्श और ऐतिहासिक संदर्भः आरएसएस बार-बार कहता रहा है कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित नहीं, बल्कि गुण और कर्म आधारित थी। भगवद्गीता का हवाला दिया जाता है कि समाज का विभाजन कर्म और स्वभाव से हुआ था। सवाल उठता है कि अगर यह परंपरा इतनी समानतामूलक थी तो समाज में जातिगत भेदभाव क्यों कायम हुआ? संघ का तर्क है कि औपनिवेशिक शासन ने जनगणना और “मार्शल रेस” जैसी अवधारणाओं से जातियों को कठोर बनाया। अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए लोगों को जातियों में बाँटा और यह विभाजन समाज में स्थायी हो गया। आलोचक इसे इतिहास का सरलीकरण मानते हैं, किंतु यक इस तथ्य को किसी भी स्तर पर नकारा जा सकता है कि उपनिवेशकालीन नीतियों ने जातीय पहचान को मजबूत किया? स्वभाविक है, नहीं, इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस संदर्भ में जो कह रहा है वह सत्य ही है।
स्वतंत्रता संग्राम का प्रश्नः आलोचक अकसर पूछते हैं कि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में क्या किया। गांधीजी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध आज भी इस प्रश्न को जीवित रखता है। लेकिन संघ के दस्तावेज बताते हैं कि 1930 की पूर्ण स्वराज घोषणा का समर्थन शाखाओं ने किया, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में विदर्भ के चिमूर-आष्टी विद्रोह में स्वयंसेवक शहीद हुए और अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं को आश्रय दिया गया। संघ राजनीतिक मोर्चे पर नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आधार को मजबूत करने पर केंद्रित रहा। यह रणनीति सही थी या गलत, इसका मूल्यांकन इतिहासकारों के मतभेदों में ही संभव है। पर जो बात साक्ष्यों में बार-बार निकलकर सामने आई है, वह यही है कि भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में संघ स्वयंसेवकों का बड़ा योगदान रहा है।
स्वतंत्रता के बाद का योगदानः स्वतंत्र भारत में संघ का जोर राष्ट्र निर्माण पर रहा। विद्या भारती, सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम और सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संगठनों ने शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। आपदाओं के समय राहत पहुंचाने में संघ की तत्परता ने उसे स्थानीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाई। दार्शनिक स्तर पर दीनदयाल उपाध्याय का “एकात्म मानववाद” और दत्तोपंत ठेंगड़ी का वैकल्पिक आर्थिक चिंतन संघ से जुड़े विचारकों की देन है। इन विचारों ने भारत को पूंजीवाद और समाजवाद के बीच तीसरा रास्ता सुझाने की कोशिश की।
आलोचना और प्रतिबंधः गांधीजी की हत्या के बाद 1948, आपातकाल के दौरान 1975 और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1992 में संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगा। हर बार वह और मजबूत होकर लौटा। आलोचक इसे राजनीतिक संरक्षण मानते हैं, समर्थक इसे संगठन की आंतरिक शक्ति। सच्चाई निश्चित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार में है जो भारत माता के लिए अपना सवस्व समर्पण कर देने की प्रेरणा सतत देती है। इसलिए संघ ने स्वयं को राजनीतिक दल की तरह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगठन की तरह प्रस्तुत किया है।
भविष्य की राह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघः सवाल यह है कि संघ की अगली सदी कैसी होगी। क्या वह केवल सामाजिक संगठन बना रहेगा या वैश्विक भारत के एजेंडे में भी भूमिका निभाएगा? संघ का कहना है कि भविष्य की चुनौतियां केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, मीडिया और डेटा केंद्रों में होंगी। युवाओं से अपेक्षा है कि वे कौशल और सेवा में योगदान दें, पेशेवर अपनी प्रतिभा को समाज की समस्याओं में लगाएं, माता-पिता बच्चों को गीता और एआई दोनों सिखाएं और बुजुर्ग अनुभव से नई पीढ़ी को दिशा दें।
अत: कहना यही होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली सदी ने आज सिद्ध कर दिया है कि यह संगठन सेवा और समरसता के जरिए समाज को जोड़ने के अपने अथक प्रयास अनेक रूपों में कर रहा है। आलोचना और विवाद उसके साथ जुड़े रहेंगे, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लाखों स्वयंसेवकों का नि:स्वार्थ योगदान भारत की सामाजिक संरचना को प्रभावित करता रहा है और आज भी कर रहा है। भारत निरंतर शक्ति सम्पन्न जो दिखाई देता है, उसमें स्वयंसेवकों की बहुत बड़ी भूमिका है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत उनके मंत्री परिषद के कई सदस्य स्वयंसेवक हैं, इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है। अन्य उदाहरण फिर तमाम है हीं।
वस्तुत: संघ की शताब्दी तीन संदेश देती है; पिछली सदी अगर लचीलेपन की थी तो अगली पुनरुत्थान की होगी। पिछली सदी अगर जागृति की थी तो अगली क्रियाशीलता की होगी। पिछली सदी अगर अस्तित्व की थी तो अगली नेतृत्व की होगी। सवाल यही है कि जब इतिहास हमें पुकारेगा, तब हम दर्शक बनेंगे या सहभागी। भारत माता तालियां नहीं, कर्म मांगती है। सौ वर्ष पूरे करने के बाद संघ ने जो संकल्प लिया है, वह केवल उसका नहीं, पूरे समाज का है। अब देखना यही होगा कि अगली सदी में यह संगठन “मौन तपस्वी साधक बनकर” भारत को कितनी शक्तिशाली दिशा में लेकर जाता है!









