मनुष्य बने रहने की कोशिश ही समकालीनता है – प्रो. नंदकिशोर आचार्य
नंद किशोर आचार्य ने बताया कि रस को समझने के लिए रस सूत्र की जगह सहृदयता व रसानुभूति की अधिक आवश्यकता है। रस सम्पूर्ण कला शास्त्र का सिद्धांत है। कला व ध्यान मनुष्य के विकास की प्रक्रिया का एक रूप है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म सृजनात्मकता का ही एक रूप है जो कि उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। जिसमें मनुष्य के आत्म की सृजनात्मकता भी शामिल है जो कि नए आयामों को उद्घाटित करती है। उन्होंने कहा कि आत्मसृजन का आनंद ही रस का केंद्रीय भाव है।
अतिथियों का स्वागत व विषय की स्थापना करते हुए प्रो. आशुतोष कुमार ने रस को सृजनात्मकता के आनंद में उपस्थित माना। समकालीन समय में रस को समझने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने का प्रश्न वक्ताओं के समक्ष रखा।
प्रो रंजन कुमार त्रिपाठी ने संस्कृत शास्त्रों में काव्यशास्त्र शब्द के निर्माण की प्रक्रिया व रसों की परंपरा का मूल्यांकन करते हुए रस को धारण करने के लिए सहृदय होने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने मम्मट, रामचंद्र शुक्ल और नगेंद्र के मध्य रस के विवेचन के अंतर्संबंधों पर विचार करते हुए साधारणीकरण की प्रक्रिया की पूर्णता के लिए आनन्दानुभूति को केंद्र में स्थापित किया।
टी एस इलियट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अनुभूति में दोहरी सांकेतिकता विषय चेतना व स्वयं की चेतना का होना जरूरी है। विषय और विषयी के मध्य में अभेद होना आवश्यक है। वह अभेद जितना अधिक होता है कला उतनी ही श्रेष्ठ होती है।
विभागाध्यक्ष प्रो. सुधा ने आगामी कार्यक्रमों के लिए इसी तरह के सहभागिता की अपेक्षा करते हुए कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए अध्यापकों व विद्यार्थियों का धन्यवाद किया।









