गोस्वामी का रहस्योद्घाटन : दुनिया के समुद्र में रोज उठती हैं पीड़ा की तरंगें!

सिरकी बंदा स्थित शिवाला गंगा राम में चल रहे श्रीमद् भागवत सप्ताह कथा का चौथा दिन भक्तों के लिए एक विशेष अनुभव लेकर आया। इस कथा का आयोजन मंदिर कमेटी और भक्तों के सहयोग से किया जा रहा है। कथा के दौरान परम पूज्य गुरुदेव धर्मेंद्र गोस्वामी जी, जो कि श्री धाम नंदगांव वाले महाराज के रूप में معروف हैं, ने उपस्थित भक्तों को बताया कि जब मनुष्य इस धरती पर आता है, तो उसके साथ पाप और पुण्य दोनों आते हैं। उन्होंने कहा कि पुण्य का फल सुख और पाप का फल दुख होता है, जिससे घर में सुख और दुख का अनुभव होना स्वाभाविक है।

कथा के दौरान महाराज ने एक महत्वपूर्ण उदाहरण साझा किया। उन्होंने कहा कि एक बार एक व्यक्ति पूर्णिमा के पवित्र दिन समुद्र के किनारे स्नान के लिए गया। वह वहां बैठा रहा और स्नान नहीं किया। जब एक व्यक्ति ने उससे इसके कारण पूछा, तो उसने कहा कि वह तब समुद्र में स्नान करेगा, जब लहरों का उफान थम जाएगा। महाराज ने इस पर चर्चा करते हुए बताया कि समुद्र कभी शांत नहीं होता और न ही हो सकता है। जो लोग समुद्र में स्नान करते हैं, उन्हें स्वाभाविक रूप से लहरों की चुनौती को सहन करना पड़ता है। इसी प्रकार, जीवन में भी कष्टों का सामना करना आवश्यक है।

महाराज ने स्पष्ट किया कि इस संसार को एक समुद्र की तरह समझना चाहिए, जिसमें हर दिन कष्टों की लहरें उठती हैं। उन्होंने भक्तों से संवाद करते हुए पूछा कि क्या वे कष्ट में भोजन करना छोड़ देते हैं? उत्तर में सभी ने सहमति दी कि भोजन आवश्यक है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। इसी प्रकार, उन्होंने बताया कि भक्तों को प्रभु की भक्ति और भजन भी नियमित रूप से करते रहना चाहिए।

कथा के दौरान नंद उत्सव का आयोजन भी किया गया, जिसमें महाराज ने ‘नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की’ भजन गाया। यह भजन सुनते ही वातावरण भक्तिमय हो गया, और सभी भक्तों ने इस आनंद में शामिल होते हुए अपनी भक्ति का प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम में भक्तजन और मंदिर कमेटी के सदस्य भी सक्रिय रूप से शामिल हुए, जिससे माहौल और भी भक्ति युक्त हो गया।

कथा के इस आयोजन ने न केवल भक्तों को ज्ञान प्रदान किया, बल्कि एकजुटता और प्रेम का भी अहसास कराया। महाराज की शिक्षाएं एवं उपदेश सभी के दिलों में एक नई ऊर्जा भरने में सफल रही। इस प्रकार, कथा का चौथा दिन सभी के लिए एक यादगार और प्रेरणादायक बनकर उभरा।