पंजाब में तापमान घटा, पराली जलाने के 2,733 मामले। क्या बढ़ेगा प्रदूषण खतरा?
पंजाब में इस समय तापमान में गिरावट का सिलसिला जारी है। हाल ही में दिन के तापमान में 0.6 डिग्री सेल्सियस की कमी आंकी गई है, जिसके विपरीत चंडीगढ़ क्षेत्र में 0.2 डिग्री की हल्की बढ़ोतरी हुई है। इस परिवर्तन के फलस्वरूप, पंजाब में सामान्य मौसम का माहौल बना हुआ है, जबकि चंडीगढ़ में तापमान में 2 डिग्री की वृद्धि देखी गई है। इसके साथ ही, राज्य में प्रदूषण के बढ़ते स्तर ने सांस संबंधी बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए चिंताएं और बढ़ा दी हैं। पंजाब की हवा अब मध्यम श्रेणी में पहुंच चुकी है, जिससे इस समस्या का समधान निकालने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
मौसम की भविष्यवाणी अनुसार, पंजाब में अगले एक सप्ताह तक बारिश की संभावना काफी कम होगी और मौसम का प्रवृत्ति अधिकतर शुष्क रहने की अपेक्षा की जा रही है। तापमान में गिरावट जारी रहने के बीच, रात के तापमान में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखे जा रहे हैं। उदाहरण स्वरूप, फरीदकोट में कल का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, वहीं अन्य सभी जिलों में न्यूनतम तापमान 20 डिग्री से नीचे रहा।
पंजाब में पराली जलाने के मामलों में वृद्धि भी एक बड़ी चिंता का विषय बन चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 19 अक्टूबर के बीच कुल 2,733 घटनाएं रिकॉर्ड की गईं, जिनमें सबसे अधिक 1,393 मामले पंजाब में पाए गए। यह आंकड़ा अन्य सभी जिलों के मुकाबले दोगुना है। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 687, हरियाणा में 642, और दिल्ली में केवल 11 मामले सामने आए हैं। इस बढ़ती समस्या ने पर्यावरणविदों को और अधिक चिंतित कर दिया है।
पंजाब में प्रदूषण का स्तर भी चिंताजनक बना हुआ है। हाल ही में अमृतसर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 156 दर्ज किया गया, जो कि अधिकतम 241 तक पहुंच गया। अन्य शहरों के एक्यूआई की स्थिति भी बहुत संतोषजनक नहीं है। जालंधर में एक्यूआई 130 रहा, जिसकी अधिकतम वायु गुणवत्ता 260 दर्ज की गई। इसी तरह, लुधियाना में एक्यूआई 130 रहा, जिसका अधिकतम स्तर 312 तक जा पहुंचा। चंडीगढ़ में भी रविवार शाम का तापमान 33.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, और आने वाले दिनों में 18 से 33 डिग्री के बीच रहने का अनुमान है।
इस प्रकार, पंजाब का मौसमी हालात, तापमान में गिरावट और बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ-साथ पराली जलाने की घटनाएँ, सभी मिलकर एक गंभीर स्थिति का संकेत दे रहे हैं। ये घटनाएँ ना सिर्फ स्थानीय पर्यावरण पर असर डाल रही हैं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रही हैं। इसलिए, राज्यों के समक्ष इस समस्या के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता महसूस होती है।









