लिफ्टिंग ना होने पर भड़के किसान: जगराओं में हाईवे जाम, सतनाम वाहेगुरु का पाठ शुरू।

लुधियाना जिले के जगराओं में, जो एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अनाज मंडी से प्रसिद्ध है, किसानों ने अपेक्षित फसल लिफ्टिंग नहीं होने के कारण भारी विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन के दौरान, किसानों ने जालंधर-बरनाला हाईवे पर स्थित सिधवां बेट के पुल पर धरना देकर चक्का जाम कर दिया। इस दौरान किसानों ने अपनी आवाज उठाते हुए सरकार के खिलाफ तीखे नारे लगाए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि सरकार मंडियों को खाली नहीं करेगी, तभी किसान अपनी फसल को मंडी में उतारेंगे। उनका आरोप है कि सरकार जानबूझकर किसानों को संकट में डालने की कोशिश कर रही है, जिससे किसान मजबूर होकर अपनी फसलें प्राइवेट कॉर्पोरेट कंपनियों को बेचने के लिए आरंभ करें।

किसान नेताओं जैसे कि हरनेक सिंह, गुरमीत सिंह और अन्य ने भारतीय किसान यूनियन पंजाब के नेतृत्व में इस धरने का आयोजन किया। उन्होंने बताया कि मंडियों में धान की बोरियों के भारी अंबार लगे हुए हैं और सरकार को चाहिए कि वह जल्दी से जल्दी इन्हें उठाए। लिफ्टिंग न होने के कारण मंडियों की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। केवल जगराओं मंडी में लगभग पौने दो लाख बोरी खुले आसमान के नीचे पड़ी हुई हैं, जबकि अन्य छोटी मंडियों में फसल उतारने की कोई जगह नहीं बची है।

किसान नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि कृषि उत्पादों की कटाई के बाद, उन्हें अपनी फसलें रखने के लिए कहीं स्थान नहीं मिल रहा है। यदि बारिश होती है, तो उनकी फसलें खराब हो सकती हैं। इस संकट के चलते, किसानों का स्पष्ट मानना है कि सरकार नियोजित तरीके से उनकी परेशानियों को बढ़ा रही है, ताकि वे मंडियों के बजाय निजी हाथों में अपनी फसलें बेचने के लिए विवश हो जाएं। यह स्थिति आगे जाकर सरकारी मंडियों के बंद होने की राह तैयार कर सकती है, लेकिन किसान इस स्थिति को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

सड़कों पर अपनी मांगों को लेकर उतरे किसानों ने हाईवे पर धरना देकर बैरिकेड लगाकर रास्ता बंद कर दिया, जिससे ट्रैफिक जाम की स्थिति उत्पन्न हो गई। आने-जाने वाले लोगों को इसके कारण काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। इस स्थिति में, किसानों ने अपना गुस्सा निकालते हुए सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। धरने के दौरान, कुछ किसानों ने सतनाम वाहेगुरु का पाठ भी शुरू किया। यह स्पष्ट है कि किसानों की स्थिति को लेकर सरकार की अनदेखी, अब किसानों की सहनशीलता को चुनौती दे रही है।

किसानों की यह एकजुटता और उनकी मांगें सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि किसानों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के विरोध प्रदर्शनों से यह दिखता है कि किसान अपनी फसल की हकदारी और अपने अधिकारों के लिए निर्णायकता के साथ खड़े हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह किसानों की समस्याओं को गंभीरता से ले और शीघ्रता से इसे सुलझाने के प्रयास करे।