अबोहर: 15 दिन से फंसा धान, किसान ने टंकी से कूदकर आत्महत्या का अल्टीमेटम दिया!

अबोहर में दाना मंडी में पिछले 15 दिनों से धान की फसल के लिए खरीदारों की प्रतीक्षा कर रहे एक किसान ने आत्महत्या की चेतावनी दी है। किसान कृष्ण कुमार ने आरोप लगाया है कि मार्किट कमेटी के सचिव और अन्य अधिकारियों पर गलत कामों में संलिप्त होने का आरोप लगाया गया है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार उनकी धान की फसल नहीं खरीदेगी, तो वह मजबूरन धान की पराली जलाने का विकल्प चुन सकते हैं। यह स्थिति कृषि क्षेत्र में गहरी चिंता का विषय बन गई है।

कृष्ण कुमार ने बताया कि उन्होंने पानी की कम खपत वाली एक विशेष धान की किस्म की बुवाई की थी, जो पंजाब सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए की गई थी। सरकार ने वादा किया था कि सभी प्रकार की धान की फसलें बिना किसी शर्त के खरीदी जाएंगी। लेकिन अब तक वह अपनी फसल के लिए मंडी में बैठे हैं, जबकि खरीद प्रक्रिया से कोई प्रगति नहीं हो रही। उन्होंने आगे बताया कि आढ़ती अक्सर उनकी फसल में कम चावल निकालने का आरोप लगाते हैं और उन्हें तुलाई के नाम पर 8 से 10 किलो धान काटने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनका 150 गट्टा धान अभी तक तोला गया है, लेकिन उसका उठान नहीं हो रहा है, जिससे उनकी चिंता बढ़ रही है।

इस बीच, किसान नेता सुखजिंदर सिंह राजन ने चेतावनी दी है कि वर्तमान स्थिति में अगर किसानों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे भी धान की पराली जलाने से पीछे नहीं हटेंगे। राजन ने मार्किट कमेटी सचिव से की गई बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने बोली प्रक्रिया का हवाला दिया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में धान की खरीद क्यों नहीं हो रही। किसान नेताओं का मानना है कि आढ़तियों और शेलर मालिकों के बीच मिलीभगत चल रही है, जो किसानों के हितों की अनदेखी कर रही है।

यह मुद्दा अबोहर के किसानों के लिए गंभीर होता जा रहा है, जहाँ उनकी मेहनत की फसल बिना खरीदार के भूमि पर बर्बाद हो रही है। डीएफसी के एक अधिकारी ने इस मामले में कहा है कि पनग्रेन द्वारा कुछ धान की खरीदी की गई है, और किसान भी इस पर संतुष्ट हैं। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि वर्तमान में मंडी में धान की खरीद में कुछ समस्याएं आ रही हैं, जिन्हें जल्द हल करने का आश्वासन दिया गया है।

समग्र रूप से यह स्थिति किसानों के लिए चिंता का कारण बन गई है, और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए तात्कालिक उपायों की आवश्यकता है। अब देखना है कि क्या सरकार इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई करती है या किसान अपनी स्थैतिकता के लिए अपने विकल्पों पर विचार करना शुरू करेंगे।